बड़े नोटों की बंदी अमरोहा के मशहूर काटन वेस्ट इंडस्ट्री पर कहर बनकर टूटी है। पानीपत और लुधियाना के कारपेट निर्माताओं से मिले आर्डर पर काटनवेस्ट (कपड़ों की कतरनों से) घरों और दफ्तरों के लिए सस्ते कालीन बनाने वाले लगभग 25 बड़े कारखानों पर ताले पड़े हैं।
स्थानीय कारोबारियों की मानें तो 90 फीसदी कारोबार कम हो गया है। मजदूरों की छुट्टी कर दी गई है। भाड़ा और मजदूरी चुकाने को छोटे नोटों का अकाल पड़ गया है। यही हाल, काटन वेस्ट से रूई बनाने की फैक्ट्रियों का है। यहां से तैयार सेकेंड ग्रेड की रूई को गद्दों, तकियों, कुशन और सस्ती रजाइयों में भरा जाता है। खरीददार गायब हैं और बाजार बेनूर। मजदूरों के सामने रोटी का संकट है।
जहां इन दिनों कुंदन मॉडल इंटर कॉलेज के पीछे कल्याणपुर रोड पर बाइक से निकलना भी मुश्किल होता था। रोड पर काटनवेस्ट के कारखानों के सामने माल से लदी गाड़ियां उतरती और लोड होती रहती थीं। वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है। नगर क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर काटनवेस्ट के बिजली के 365 कारखाने हैं। करीब 400 से 500 लोग कच्चे माल की कटाई, छटाई और ट्रेडिंग का काम करते हैं।
अमरोहा कार्डिंग मशीन टेक्सटाइल्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष रियाजुद्दीन मंसूरी ने बताया कि 90 प्रतिशत कारोबार प्रभावित हुआ है। नोटबंदी का सीधा असर कारोबार पर पड़ा है। नोटबंदी की किल्लत के झमेले में फंसे लोगों को खाना और कपड़े की जरूरत है। लिहाफ-गद्दे उसकी बाद की जरूरत है। रुपयों को लेकर मारामारी चल रही है।
बैंकें लोगों की लाइनों से पटी पड़ी हैं। पर्याप्त नोट भी नहीं मिल रहे। भाड़ा और लेवर की सबसे बड़ी समस्या है। खुले रुपये न होने से भाड़ा और लेबर का भुगतान नहीं हो पा रहा।
जबकि इन दिनों में 75 प्रतिशत कारोबार हो जाता था। अब 10 से 12 प्रतिशत ही हो सका है।