अमरोहा। चार दिवसीय सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा नहाय खाय के साथ शुक्रवार (आज) से शुरू होगी। इसके बाद खरना होगा। इस दिन व्रती निर्जला उपवास रखेंगी और शाम को पूजा के बाद खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण करेंगी। इस पर्व को लेकर लोगों ने तैयारियां पूरी कर ली है।
श्री बाबा गंगा नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष पंडित आशुतोष त्रिवेदी ने बताया कि छठ महापर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो चार दिन तक चलता है। बिहार और पूर्वांचल राज्यों के लोग पिछले कई सालों से श्रीवासुदेव तीर्थ मंदिर के सरोवर पर पहुंचकर श्रद्धापूर्वक छठ पर्व मनाते हैं। छठ पर्व को सूर्य छठ भी कहा जाता है, क्योंकि सूर्यदेव रोशनी के साथ ही ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। जिससे वर्ष में एक बार विधि विधान से उनकी पूजा अर्चना हो जाती है।
चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व इस बार 17 नवंबर से नहाय-खाय के साथ प्रारंभ होगा। इस दिन व्रत रखने वाले गंगा जल समेत नदियों में डुबकी लगाकर चूल्हे पर आम की लकड़ी से खाना बनाएंगे, जिसमें देसी घी और सेंधा नमक प्रयोग होता है और इसी दिन छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाली सारी सामग्री की खरीदारी भी की जाती है। व्रत का समापन 20 नवंबर को होगा।
नहाय खाय :
छठ के पहले दिन को नहाय खाय के नाम से जाना जाता है। इस साल नहाय खाय 17 नबंवर, 2023 को किया जाएगा। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। व्रत करने वाली महिलाएं इस दिन केवल एक बार भोजन करती हैं।
खरना :
नहाय-खाय के अगले दिन यानी छठ पूजा के दूसरे दिन शाम को खरना की पूजा होगी। इसमें व्रती सुबह से उपवास रखकर शाम को लकड़ी के चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर, पूड़ी या रोटी बनाएंगी। घी लगी रोटी और खीर के साथ मौसमी फल से भगवान भास्कर को प्रसाद अर्पण करती हैं और फिर व्रती के प्रसाद ग्रहण करने के बाद अन्य लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।
डूबते सूर्य को अर्घ्य : खरना के बाद व्रती का 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। खरना के अगले दिन व्रती नदी या तालाब किनारे सपरिवार जाती हैं और नदी में खड़े होकर विधि-विधान से छिपते सूर्य को पहला अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन अर्घ्य के सूप को फल, ठेकुआ मौसमी फल और फूल से सजाया जाता है। अर्घ्य के बाद लोग या तो घर लौट आते हैं या घाट पर ही रातभर रहते हैं।
उगते सूर्य को अर्घ्य : छठ पूजा के चौथे दिन व्रती नदी या तालाब में या कहीं भी जल में खड़े होकर उदीयमान सूर्य को विधि-विधान से सजे हुए सूप के साथ अर्घ्य देती हैं और इसी के साथ लोक आस्था का पर्व छठ संपन्न हो जाता है। व्रती पारण कर छठ पूजा का व्रत तोड़ती हैं और इस तरह से छठ पूजा की समाप्ति होती है।