त्योहार जब-जब आया, आंखों में आंसू लाया। इस दिवाली पर कुछ ऐसी ही हालत है उन परिवारों की जिनके ‘घर के चिराग’ वर्षों से लापता है। हर त्योहार पर इन लोगों की आंखें अपनों के लौटने का इंतजार करती हैं। लापता बच्चों के मां-बाप हर आने जाने वाले से यही पूछते हैं कि तुमने हमारे लाडले को कहीं देखा है।
दुखी परिवारों को यही आस है कि कभी तो कोई आकर उनके आंख के तारे की सलामती की खबर देगा। जिले में 18 वर्ष से कम आयु के 24 बच्चे लापता हैं। जिनमें पांच बच्चों को लापता हुए आठ साल बीत गए। वहीं दो बच्चे गायब हुए नौ साल हो गए। थक हार कर पुलिस ने भी 15 मामलों में फाइनल रिपोर्ट लगा दी है।
जनपद में 2007 से मौजूदा साल तक 26 बालक गायब हुए थे। जिनमें दो लौट कर वापस आ गए। 24 अभी भी लापता हैं। गायब बालक 18 वर्ष से कम आयु के हैं। शुरू में परिजनों ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी, लेकिन काफी समय बीत जाने पर बाद में पुलिस ने मामले को अपहरण में तरमीम कर लिया। परिजन रिश्तेदारियों, सगे संबंधियों से लेकर जान पहचान वाले हर जगह ढूंढ कर हार गए। साधु सन्यासियों और तांत्रिकों का भी दरवाजा खटखटाया।
मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा, मठ, चर्च आदि धार्मिक स्थलों पर जाकर मत्था टेक आए। लेकिन कहीं से भी गायब बच्चे का खोज नहीं मिला है। रात दिन इंतजार में रोते-रोते आंखों का पानी सूख गया है। गम में आंखें पथरा गईं हैं लेकिन पीड़ित परिवारों की उम्मीद नहीं टूटी। आज भी अपनों के लौटने का इंतजार है। पुलिस भी तलाश कर थक गई है। 15 मामलों में पुलिस ने अपनी फाइनल रिपोर्ट भी लगा दी है।
लापता बच्चों का चाइल्ड हेल्प लाइन पर डाटा अपलोड किया गया है, एनजीओ व अनाथ आश्रम आदि में भी संपर्क किया जा रहा है, थानों की टीम भी लगाई गई है।
- उदय शंकर, एएसपी।