अगर आपको रमजान के दौरान किसी मस्जिद में ऐसी किरत सुनने को मिले, जो दिलों को छू जाए तो मुमकिन है कि वह आवाज अमरोहा के हाफिज की हो सकती है। जी हां, आमों की नगरी अमरोहा के छह सौ से अधिक हाफिज इस बार देशभर की तमाम मस्जिदों में नमाज-ए-तरावीह में कुरान सुनाएंगे। ज्यादातर हाफिजों की बुकिंग पहले ही हो चुकी है, जो बचे हैं, वे भी महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, कर्नाटक आदि प्रदेशों में मौजूद मस्जिदों के मुतवल्ली के संपर्क में हैं। वे दस मई के बाद विभिन्न प्रदेशों के लिए रवाना हो जाएंगे। अमरोहा के हाफिजों की डिमांड की वजह यह है कि यहां के कई पुराने मदरसों में हाई क्वालिटी की इस्लामी शिक्षा दी जाती है।
माह-ए-रमजान पर नमाज-ए-तरावीह के लिए अमरोहा के हाफिजों की काफी डिमांड है। हर साल मदरसों से निकलने वाली हाफिज की नई पौध देश के तमाम राज्यों की मस्जिदों में कुरान सुनाने को तैयार रहती है। शहर के मदरसा इस्लामिया अरबिया जामा मस्जिद के नायब मोहतमिम मुफ्ती हमजा बताते हैं कि यूपी-बिहार के मदरसों से सबसे ज्यादा हाफिज निकलते हैं। अकेले उनके मदरसे से इस साल 438 बच्चे हाफिज-ए-कुरान बने। इनमें दो तिहाई बच्चे रमजान के मुकद्दस महीने में नमाज-ए-तरावीह पढ़ाने दूसंरे राज्यों में जाएंगे।
ऐसे ही दूसरे मदरसों के निकले बच्चे भी देश के अलग-अलग राज्यों में कुरान पढ़ाने जाते हैं। मदरसा जामिया नूरिया अशरफुल उलूम दाउद सराय रोड के मोहतमिम मौलाना तय्यब कादिरी नईमी ने बताया कि जिले के मदरसों से हर साल नौ सौ से अधिक तालिब-ए-इल्म हाफिज-ए-कुरान बनकर निकलते हैं। जो कई राज्यों में तरावीह पढ़ाने जाते हैं। इसके लिए गैर राज्यों के मुतवल्ली शहर के मदरसों के प्रिंसिपल के संपर्क में हैं। शहर तय होने के बाद हाफिजों की रवानगी हो जाती है। जहां पांच दिन से 28 दिन में नमाज-ए-तरावीह में कुरान मुकम्मल करते हैं।