मंजिल दूर और सफर बहुत हैं, छोटी सी जिंदगी की फिकर बहुत है। मार डालती ये दुनिया कब की हमें, पर मां की दुआओं में असर बहुत है...
यह पंक्तियां उन बच्चों के लिए सटीक बैठती हैं, जिनकी मांओं ने समाज के तानों कर परवाह किए बगैर कड़ी मेहनत और परिश्रम कर अपने कलेजे के टुकड़ों की जिंदगी में चार चांद लगा दिए। खुद भूखी प्यासी सोई लेकिन बच्चों की जिंदगी के अंधकार को दूर करने के लिए लालन-पालन से लेकर पढ़ाई-लिखाई का पूरा ख्याल रखा। अच्छी तालीम दिलाई। मां के ए के बीच बच्चे खुदबखुद तरक्की की इबादरत लिखते गए। किसी ने वैज्ञानिक बनकर देश-दुनिया में मां का नाम रोशन किया तो कोई मां की दुआ की बदौलत विदेशी बाबू बन गया।