जगदीशपुर में 12 रोजा कांफ्रेंस में तकरीर करते मौलाना आलम कादरी। स्रोत- संवाद
कमरौली (अमेठी)। जगदीशपुर के रायबरेली रोड स्थित मदरसा में आयोजित 12 दिवसीय शहीद-ए-इस्लाम कांफ्रेंस की अंतिम यानी 12वीं रात रविवार कर्बला की दर्दनाक दास्तान और शाम-ए-गरीबां के मार्मिक दृश्य के साथ संपन्न हुई। भारी संख्या में पहुंचे अकीदतमंद गम के माहौल में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हुए भावुक हो उठे।
कार्यक्रम की सरपरस्ती करते हुए मौलाना आलम कादरी ने कहा कि कर्बला की जंग हक और बातिल के बीच का संघर्ष थी, जिसमें हजरत इमाम हुसैन ने इंसानियत, न्याय और सच्चाई की खातिर अपनी और अपने पूरे परिवार की कुर्बानी दी। उन्होंने इसे इस्लामी इतिहास का वह अध्याय बताया जो आज भी ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने का हौसला देता है। कारी राशिद हुसैन और मौलाना अरशद ने कर्बला की घटना को सब्र, साहस और इस्लामी उसूलों की पराकाष्ठा बताया।
कार्यक्रम के दौरान प्रसिद्ध शायरों की नज्मों और मर्सियों ने माहौल को गमगीन कर दिया। विशेष रूप से पढ़ा गया यह शेर मिटाने जुल्मों सितम का गुरूर निकलेगा, फिजा को चीर कर सूरज जरूर निकलेगा, जहां हुसैन ने रखी थी अपनी पेशानी, उसी जमीन के हिस्से से नूर निकलेगा ने उपस्थित जनसमूह को भीतर तक झकझोर दिया। जैसे ही शाम-ए-गरीबां का दृश्य पेश हुआ, माहौल पूरी तरह मातम में बदल गया और हर आंख नम हो गई।