अमेठी सिटी। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता बेमिसाल है। जब-जब भक्तों पर विपदा आती है, तब-तब ईश्वर उसे दूर करने के लिए अवश्य आते हैं। ये बातें ब्लॉक गौरीगंज के गोपालापुर गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन प्रवाचक जानकीदास महाराज ने कहीं।
प्रवाचक ने बताया कि कृष्ण और सुदामा की सच्ची मित्रता को भुलाया नहीं जा सकता। सुदामा पत्नी के आग्रह पर मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे। द्वारपालों ने उन्हें भिक्षा मांगने वाला समझकर द्वार पर रोक दिया। उन्होंने द्वारपालों को बताया कि वे द्वारिकाधीश के मित्र हैं। द्वारपालों ने जाकर श्रीकृष्ण को जानकारी दी। नाम सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण द्वार की ओर दौड़ पड़े और सुदामा को सीने से लगा लिया।
दरबार में ले जाकर सुदामा को सिंहासन पर बैठाया और कुबेर का धन देकर मालामाल कर दिया। बताया कि अजामिल जैसे पापी का उद्धार भगवान नारायण का नाम लेने से हो गया। नाम संकीर्तन की अद्भुत महिमा है। भागवत के अंतिम श्लोक में नाम संकीर्तन की महिमा का वर्णन किया गया है। 24 घंटे में अगर एक बार भी भगवान के नाम का संकीर्तन हो जाए तो जीव का कल्याण हो जाएगा। प्रवाचक ने दत्तात्रेय के 24 गुरूओं, परीक्षित मोक्ष आदि प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया। इस मौके पर भोलानाथ अग्रहरि, संतोष कुमार, सतीश कुमार, मनीष, कुलदीप, राजेंद्र पांडेय, बब्लू शुक्ल आदि मौजूद रहे।
पर्चा दिखाता विनोद।
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