शाहगढ़ (अमेठी)। आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा से मिलन है। जो निष्काम कर्मों व समर्पण से मिलता है, महारास उसी का हिस्सा है। ये बातें सोमवार को विकास खंड के पूरे रामदत्त मिश्र मजरे पनियार में श्रीमद्भागवत कथा में प्रवाचक डॉ. रघुपति त्रिपाठी ने कहीं।
प्रवाचक ने कहा कि आत्मा का अंत नहीं होता, वह सिर्फ वस्त्र बदलती है। आत्मा परमात्मा के अस्तित्व को समझने की जरूरत है। उसी का हिस्सा है श्रीकृष्ण की महारास लीला। उन्होंने बताया कि रास तो जीव और परब्रह्म ईश्वर मिलन की कथा है, जिससे भक्त ईश्वर प्रेम में आनंदित होते हैं और उनके जीवन की समस्या समाप्त हो जाती है।
प्रवाचक ने कहा कि राम का चरित्र अनुकरणीय है तो वहीं श्रीकृष्ण का चरित्र विचारणीय है। श्रीकृष्ण के विवाह प्रसंग को सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने विदर्भ देश के राजा की पुत्री रुक्मिणी का हरण कर विवाह किया। रुक्मिणी स्वयं साक्षात लक्ष्मी हैं, जबकि श्रीकृष्ण साक्षात नारायण हैं।
नारायण और लक्ष्मी एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते। उन्होंने कहा कि परमात्मा आत्मा का परम रूप है, जो मनुष्य लक्ष्मी नारायण को पूजता है और उनकी सेवा करता है, उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त हो जाती है। इस मौके पर तारकेश्वर मिश्रा, गौरीगंज विधायक राकेश प्रताप सिंह, अष्टधारी प्रताप सिंह, कंसराज सिंह, घीसन मिश्रा, कप्तान शुक्ला, शेष नारायण पांडेय, चंद्रशेखर मिश्रा, मुन्ना पांडेय आदि मौजूद रहे।