कटेहरी। क्षेत्र के आदमपुर में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया गया। प्रवाचक मुकेशानंद ने बताया कि वास्तविक धनवान वही है, जो तन, मन और धन से सेवा और भक्ति करता है।
परमात्मा की प्राप्ति केवल सच्चे प्रेम से संभव है। केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि आचरण और समर्पण ही वास्तविक संपत्ति है। पद और शक्ति क्षणिक हैं। नैतिक मूल्यों और संस्कारों के लिए गीता, भागवत और रामायण का ज्ञान उपयोगी है। भक्ति का मूल आधार निष्कपट प्रेम है। राक्षसी पूतना ने बालक कृष्ण को स्तनपान कराने के बहाने विषपान कराने का प्रयास किया, लेकिन कृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही उसका वध कर दिया और उसे मोक्ष प्रदान किया। जब माता यशोदा ने कृष्ण को पूतना के वक्षस्थल से उठाया तो पंचगव्य से स्नान कराया। जब कृष्ण से मुख खोलने को कहा तो उनके मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन हुए। आकाश, दिशाएं, पर्वत, समुद्र, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, पृथ्वी, त्रिगुण, काल, कर्म सहित संपूर्ण सृष्टि माता को दिखाई दी। यहां तक कि ब्रज, नंद का घर और स्वयं यशोदा भी उसी दृश्य में उपस्थित थीं। कृष्ण ने स्वयं अपनी योगमाया से माता को पुनः बाल रूप का ही स्मरण कराया।
धर्म का मूल तत्व कर्तव्य पालन और सत्य आचरण
जलालपुर। क्षेत्र के एकडंगा सेमरा में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को प्रवाचक रामजस मिश्रा ने बताया कि विभिन्न युगों में अवतारों का उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश रहा है। जीवन में परिस्थितियों के अनुसार आचरण और निर्णय महत्वपूर्ण हैं। धर्म का मूल तत्व कर्तव्य पालन और सत्य आचरण है। केवल पूजा नहीं, बल्कि अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन ही वास्तविक धर्म है। कृष्ण जन्म से ही विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हैं। राम मर्यादा व कृष्ण नीति के प्रतीक हैं। प्रवाचक ने त्रेतायुग में राम अवतार और द्वापरयुग में कृष्ण अवतार के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि दोनों अवतारों ने अलग-अलग परिस्थितियों में समाज को दिशा दी। संवाद
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वर्तमान समय में समाज को नैतिक मूल्यों की आवश्यकता
भीटी। क्षेत्र के नरायनपुर घाट स्थित एक निजी अस्पताल परिसर में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को प्रवाचक औचित्यानंद राघव दास ने बताया कि असत्य और छल का अंत अवश्य होता है। पद और शक्ति का दुरुपयोग संकट को जन्म देता है। केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में सत्य और सेवा का पालन जरूरी है। कठिन परिस्थितियों में संयम और सामूहिकता समाधान का मार्ग बनते हैं। धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और श्रवण जीवन में नैतिक आधार मजबूत करता है। वर्तमान समय में समाज को नैतिक मूल्यों की आवश्यकता है। द्वापर युग में अवतार का उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म की पुनर्स्थापना था। गोवर्धन प्रसंग के माध्यम से सामूहिक विश्वास और अहंकार त्याग का संदेश दिया गया। संवाद
ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग सरल और निष्कपट
कटेहरी। क्षेत्र के चनहा पकड़ी में श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन मंगलवार को प्रवाचक पंकज शास्त्री ने बताया कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग सरल और निष्कपट है। पद और शक्ति का अहंकार संकट को आमंत्रित करता है। केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यवहार में सत्य और करुणा अपनाना आवश्यक है। विपरीत परिस्थितियों में संयम और विश्वास से समाधान संभव है। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्य, करुणा और कर्तव्य पालन भी उसका हिस्सा है। उन्होंने वर्तमान समय में सामाजिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि परिवार और समाज में नैतिक शिक्षा का महत्व बढ़ रहा है।