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साथियों के साथ जेल में लगा दी थी आग

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भीटी। जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बात होती है तो उनमें भीटी थाना क्षेत्र के समरसिंहपुर गांव निवासी रामजोखन सिंह का नाम प्रमुखता से आता है। आजादी के लिए घर-परिवार के साथ गांधी आश्रम की नौकरी छोड़कर संघर्ष करने के साथ ही उन्होंने वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। इसके लिए उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। जेल में रहने के दौरान उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज और बुलंद कर दी। बताया जाता है कि साथियों के साथ मिलकर जेल में ही आग लगा दी थी। इसके चलते उन्हें दो वर्ष के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी पड़ी थी।
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देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जिले में आजादी के दीवानों के प्रति लोगों में सम्मान व उत्साह चरम पर है। हर कोई आजादी के दीवानों की वीर गाथा को याद कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। शनिवार को अमर उजाला टीम ने भीटी तहसील क्षेत्र के समरसिंहपुर गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामजोखन सिंह के परिवार से मुलाकात की। उनके पौत्र भाजपा नेता राजमणि सिंह ने बताया कि उनके बाबा का जन्म वर्ष 1910 में हुआ था। पारिवारिक हालात भले ही ठीक न रहे हों, लेकिन उनका देश की आजादी के प्रति जो जुनून था, उसका आज भी हर कोई कायल है। उन्होंने घर-परिवार को दरकिनार कर देश की आजादी में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके इस गौरवशाली संघर्षों को याद करने के बाद दिल गदगद हो जाता है।
बताया कि उनके बाबा न सिर्फ स्थानीय स्तर पर पूरी मुखरता से अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करते थे, बल्कि अंग्रेजी सिपाहियों की पिटाई करने व उनके काले कानूनों का विरोध करना ध्येय बन चुका था। वर्ष 1942 में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आंदोलन शुरू किया तो उन्होंने गांधी आश्रम की नौकरी छोड़कर उसमें सक्रिय भागीदारी निभाई। इसके चलते उन्हें 6 माह की सजा मिली। जेल में रहने के दौरान अंग्रेजी हुकूमत व उसकी उत्पीड़नात्मक कार्रवाई का खुलकर विरोध किया और उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ जेल में ही आग लगा दी थी। इससे उन्हें 2 वर्ष के अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी पड़ी थी।
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उनके आंदोलन के साथी 6 माह की सजा पूरी कर छूट गए थे, लेकिन वे घर नहीं आए तो परिवारीजनों को चिंता होने लगी थी। अफवाह फैल गई थी कि उन्हें फांसी दे दी गई है। इससे पुत्र वियोग में उनकी माता का निधन भी हो गया। परंतु करीब दो वर्ष बाद जब वह छूटकर घर आए तो न सिर्फ परिवारीजनों बल्कि आसपास के कई गांवों के लोगाें ने उनका अभिनंदन किया था। देश को आजादी मिलने के बाद फिर उन्होंने गांधी आश्रम की नौकरी की और सेवानिवृत्त तक अपनी सेवा दी। वर्ष 1999 में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी स्मृति में गांव में स्मारक स्थल भी बना हुआ है।
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