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यहां तो आम लोगों पर फर्जीवाड़ा रोकने की जिम्मेदारी

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अंबेडकरनगर। बेसिक शिक्षा विभाग के हालात देखिए। नौकरी के नाम पर फर्जीवाड़ा रोकने की जिम्मेदारी उसने आम नागरिकों पर डाल रखी है। खुद का प्रयास कर फर्जीवाड़ा पकड़ने की सुध जिले के बेसिक शिक्षा महकमे को नहीं है। लंबे समय से एक के बाद एक ऐसे तमाम शिक्षक सामने आ रहे जो फर्जी प्रमाणपत्र पर नौकरी कर रहे थे। अब तक ऐसे 15 शिक्षकों की सेवा समाप्त की जा चुकी है। इनमें से जदातर मामले शिकायत के बाद सामने आए हैं। इसके बावजूद जनपद स्तर पर विभाग ने संदिग्ध प्रमाणपत्रों की एक सिरे से जांच कराने के नाम पर रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है। इससे कई तरह के गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, लेकिन विभाग को जैसे इसकी कोई परवाह ही नहीं है।
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बेसिक शिक्षा विभाग में फर्जी प्रमाणपत्रों के नाम पर नौकरी हासिल करने और सत्यापन के दौरान विभागीय मिलीभगत के जरिए नौकरी करते रहने का कलंक पीछा नहीं छोड़ रहा है। एक के बाद एक ऐसे प्रकरण सामने आ रहे हैं, जिनमें फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरी हथिया ली गई। इनमें से चंद मामले जाति व अन्य प्रमाणपत्रों के हैं तो ज्यादातर मामलों में शैक्षिक प्रमाणपत्र फर्जी ढंग से लगा दिए गए थे। बीते 7 वर्ष में 15 शिक्षकों को फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरी हासिल करने के आरोप में बर्खास्त किया जा चुका है। वर्ष 2013 से अब तक के अंतराल में इतने मामले सामने आए हैं।
इसके बावजूद बेसिक शिक्षा महकमा अपनी कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं कर रहा है। संदिग्ध किस्म के प्रमाणपत्रों की जांच कर खुद से फर्जीवाड़ा पकड़ने की जरूरत बेसिक शिक्षा विभाग को जिला स्तर पर नहीं हो पा रही। यह हाल तब है, जब एक के बाद एक फर्जीवाड़े जिले में सामने आ रहे हैं। ताजा मामला रामनगर विकास खंड का है, जहां हाईस्कूल के फर्जी अंकपत्र के आधार पर वर्ष 1991 से सहायक अध्यापक की नौकरी करते कौशल किशोर त्रिपाठी को पकड़ा गया है। उसे बर्खास्त कर दिया गया। विभाग को फर्जीवाड़े की जानकारी लगभग 30 वर्ष बाद तब हो सकी, जब एक नागरिक ने इसकी शिकायत दर्ज कराई।
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इससे पहले रामनगर के ही कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में फर्जी नाम व प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी कर रही विज्ञान शिक्षिका के बारे में भी विभाग को तब जानकारी हो पाई, जब मामले की शिकायत उच्चस्तर पर हुई। शिक्षिका को नौकरी देने में जरूरी छानबीन न तो शुरू में की गई और न ही नौकरी देने के बाद शिकायत होने तक ऐसी कोई छानबीन करने की जरूरत विभाग ने महसूस की।
विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की इसी मनमानी व लापरवाही का फायदा फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी कर रहे शिक्षक व शिक्षामित्र उठाते आ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि जिले में अभी भी तमाम ऐसे शिक्षक व शिक्षामित्र नौकरी कर रहे हैं, जिनके प्रमाणपत्र फर्जी हैं। इसके बावजूद जिलास्तर पर विभाग की तरफ से अभियान चलाकर प्रमाणपत्रों का सत्यापन नहीं कराया जा रहा है। विभाग के इस रवैये को लेकर नागरिकों के बीच कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
एक संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र के नाम पर ही ज्यादातर फर्जीवाड़े सामने आ रहे हैं। इसी संस्कृत विद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर तमाम शिक्षकों ने नौकरी हासिल कर ली है। सिर्फ अंबेडकरनगर में ही नहीं, प्रदेश के अन्य जनपदों में भी इसी विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे नौकरी की जा रही है। राज्य सरकार ने इसी सबके चलते एसआईटी का भी गठन कर रखा है। जिले में भी इस विश्वविद्यालय के कई फर्जी प्रमाणपत्र के जरिए नौकरी हासिल करने के मामले पकड़ में आए हैं। इसके बाद भी जिलास्तर पर इस विद्यालय की डिग्री का सत्यापन कराने की जरूरत न जाने क्यों नहीं महसूस की जा रही है।
अभी शिक्षकों की नियुक्ति मामले में पुलिस वेरीफिकेशन आदि की जांच चल रही है। एक दो संस्थानों के नाम पर फर्जी प्रमाणपत्र के मामले सामने आ रहे हैं। इन प्रमाणपत्रों के आधार पर जिले में नौकरी कर रहे शिक्षकों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया जाएगा। फिलहाल जो शिकायतें सामने आ रही हैं, उसका निस्तारण प्राथमिकता के साथ कराया जा रहा है।
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अतुल कुमार सिंह, बीएसए
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