संजीव द्विवेदी
अंबेडकरनगर। रामायण मंचन में श्रीराम मुख्य नायक होते हैं, लेकिन रावण का किरदार भी दर्शकों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहा है। दशहरा आते ही रामलीला के मंच सजने लगते हैं, पर अब मंचों पर रावण खोजना मुश्किल हो गया है। कलाकारों की नई पीढ़ी इस जटिल किरदार से या तो दूरी बना रही है। वहीं अधिवक्ता विशाल मेहरोत्रा पिछले 25 वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं।
पहले रामलीला रामचरित मानस की चौपाइयों के साथ होती थी। कलाकारों में ग्रंथ की समझ और संवादों में आत्मा होती थी। बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक, पूरा गांव रामलीला देखने उमड़ पड़ता था। आज हालात बदले हैं, टेंट की जगह पंडाल आए और दर्शकों की भीड़ धीरे-धीरे घटने लगी। फिर भी कुछ समर्पित कलाकार हैं, जो रावण को सिर्फ एक खलनायक नहीं, बल्कि एक विद्वान, योद्धा और नैतिक शिक्षा देने वाले चरित्र के रूप में मंच पर जीवंत करते हैं।
केवल अभिनय नहीं, एक भाव है
लखनऊ में वकालत करने वाले विशाल मेहरोत्रा पिछले 25 वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। वह कहते हैं कि यह किरदार केवल अभिनय नहीं, बल्कि एक भाव है, जिसमें विद्वता और वीरता का संतुलन ज़रूरी है।
डिजिटल युग में फीकी पड़ी रामलीला की चमक
विद्यालय प्रबंधक सन्नी जायसवाल बीते आठ वर्षों से रावण की भूमिका निभा रहे हैं। वे मानते हैं कि मोबाइल और ओटीटी के इस युग में रामलीला की दर्शक संख्या साल दर साल घट रही है। केवल सीता हरण जैसे विशेष दिनों में ही भीड़ दिखती है।
रावण बना जीवन का शिक्षक
सब्जी कारोबारी श्रवण मौर्या के अनुसार रावण का किरदार केवल मंचन नहीं, बल्कि संयम, धैर्य और नैतिकता का पाठ भी है। यह किरदार उन्हें भीतर से अनुशासित करता है और शक्ति के साथ विवेक के महत्व को समझाता है।