अंबेडकरनगर। गरीबी में पली बढ़ी पहलवान आयशा प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर जिले का नाम रोशन कर रहीं हैं। आयशा के पिता इस दुनिया में नहीं हैं। खुद की कमाई से दिन-रात कड़ी मेहनत कर उन्होंने कुश्ती के दांवपेच सीखे। इसके बाद सफलता कदम चूमने लगी। आयशा उन बालिकाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं, जो पैसे के अभाव में अपने सपना छोड़ घट बैठ जाती हैं।
जलालपुर के पक्खनपुर की आयशा के पिता दिल्ली में रहते थे। इन्हीं के साथ वह दिल्ली में रहकर पढ़ाई करती थी। इसी बीच खेलकूद में रुचि बढ़ी तो बैडमिंटन खेलना शुरू किया। वर्ष 2018 में इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में वह नियमित कुश्ती का अभ्यास करने लगी। उनकी मेहनत रंग लाई और एक के बाद एक सफलता मिलती गई। स्टेट चैंपियन होने के साथ ही दो बार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी की तरफ से राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग ले चुकी हैं। इसके बाद हिमांचल प्रदेश में हुए ओपन टूर्नामेंट में क्वार्टर फाइनल में अपनी जगह बनाने के बाद नेशनल में विजेता बनने से चूक गईं थीं।
आयशा पर दुखों का पहाड़ उस समय टूट पड़ा, जब कोरोना काल में उनके पिता की मृत्यु हो गई। बड़े-बड़े सपने पल भर में चूर होते नजर आने लगे। इसके बाद भी आयशा ने हिम्मत से काम लिया। दिल्ली में किराये पर कमरा लेकर अभ्यास जारी रखा। आर्थिक तंगी आड़े न आए, इसके लिए जगह-जगह हो रही प्रतियोगिताओं में जाकर स्पोर्ट्स के कपड़े बेचना शुरू किया। इससे होने वाली आमदनी से अपना खर्च चलातीं हैं। इसी दौरान वह अंबेडकरनगर के कुश्ती कोच अभिषेक उपाध्याय के मार्गदर्शन में जिले के लिए प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगीं।
बीते बुधवार को हुई प्रतियोगिता में 72 किलोग्राम भार वर्ग में प्रथम आने पर मौजूद जिलाधिकारी अविनाश सिंह सिंह ने जिले की ऐसी प्रतिभा को प्रोत्साहित करते हुए स्कूटी देने की घोषणा की। आगामी 22 फरवरी को अंबेडकरनगर दिवस पर आयशा को स्कूटी की चाभी सौंपी जाएगी।
लक्ष्य वही जो बड़ा नहीं, जीता वही जो डरा नहीं
पहलवान आयशा के हौसले काफी बुलंद हैं। उन्होंने युवाओं के लिए कहा कि लक्ष्य वही जो बड़ा नहीं, जीता वही जो डरा नहीं। वह कहती हैं कि लक्ष्य निर्धारित करके कड़ी मेहनत करिए। सफलता खुद ब खुद कदम चूमने लगेगी। मैंने कठिन परिस्थितियों में भी कुश्ती की तैयारी की। आने वाले समय में मेरा प्रदर्शन और बेहतर होगा, इसकी मुझे पूरी उम्मीद है।