जिले में न तो कोई आयोजन ही सरकारी स्तर पर होता है और न ही कोई गैर सरकारी संस्थाओं या जनप्रतिनिधियों द्वारा कोई कार्यक्रम किया जाता है। गांधी आश्रम स्थित राष्ट्रपिता की प्रतिमा पर माल्यार्पण तक ही ले देकर पूरी कवायद सीमित रह जाती है।
मालूम हो कि हर साल शनिवार 30 जनवरी को पूरा देश जब शहीद दिवस मना रहा होता है तो जिले में इसे लेकर सिर्फ औपचारिकता ही नजर आती है। कारण यह कि वतन पर जान कुर्बान करने वाले शहीदों को लेकर प्रशासन व शासन लम्बे समय से जिले में उदासीन रवैया अपनाए हुए है।
यह कहावत भले ही बहुत चर्चित हो कि शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, लेकिन यहां तो कई कई वर्ष बीत जाने के बाद भी मेले जैसा आयोजन नहीं हो पाता है। जिला मुख्यालय स्थित अकबरपुर ब्लाक में सेनानियों की स्मृति में शिलापट लगाकर पार्क जैसा स्वरूप दिया गया है, लंबे समय से वहां कोई आयोजन नहीं हो सका है।
सम्मनपुर थाना क्षेत्र के सुल्तानपुर तुलसीपुर गांव में शहीद बजरंगी यादव की याद में मूर्ति तो लगा दी गई, लेकिन कभी किसी प्रकार के आयोजन की सुध प्रशासन को नहीं है। 6 अगस्त 2010 को वे त्रपिुरा के नरकटा पोस्ट पर हुए नक्सली हमले में शहीद हुए थे। उन्हें राष्ट्रपति पद से सम्मानित भी किया जा चुका है।
शहीद के परिजन लंबे समय से पार्क तक रास्ते की मांग करते चले आ रहे हैं, लेकिन मार्ग निर्माण की सुध नहीं ली जा रही है। इससे परिजनों में खासी नाराजगी व्याप्त है। भीटी तहसील अन्तर्गत जैतूपुर गांव निवासी शहीद उदयप्रताप सिंह को भी प्रशासन ने पूरी तरह बिसार रखा है।
वर्ष 2001 में हुई कारगिल लड़ाई के दौरान वे शहीद हुए थे। इसके बावजूद वायदे के मुताबिक न तो वहां वाटिका बनवाई गई और न ही समाधिस्थल को जाने वाले मार्ग पर प्रवेश द्वार बनवाया गया। पत्नी उमा सिंह ने बताया कि शहीद कोटे से परिवार को साढ़े चार बीघा भूमि मिली थी, लेकिन अधिकांश भाग पर कब्जा दूसरे लोगों ने ही जमा रखा है। अन्य शहीद स्थलों का भी हाल कुछ ऐसा ही है।