शारीरिक रूप से कमजोर पेंशनर्स के लिए रैंप की व्यवस्था नहीं होने से उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा कई कर्मचारियों की चुनाव में ड्यूटी लगने से भी प्रमाणपत्र जमा करने में समस्या आ रही है। उधर, पेंशन फॉर्म भरने को लेकर कार्यालय के बाहर ही एजेंट सक्रिय हैं।
वे फॉर्म भरने के लिए पेंशनर्स से 20 से 30 रुपये ले रहे हैं। इनके विरुद्ध किसी प्रकार की कार्रवाई करने को लेकर विभागीय अधिकारी गंभीर हैं। नतीजतन इसका खामियाजा पेंशनर्स को भुगतना पड़ रहा है। लगभग नौ हजार पेंशनर्स में से अब तक महज 1200 ने ही अपना जीवित प्रमाणपत्र जमा किया है।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन के लिए प्रत्येक वर्ष नवंबर माह में जीवित प्रमाणपत्र देना पड़ता है। ऐसे में नवंबर शुरू होते ही पेंशनर्स जीवित प्रमाणपत्र जमा करने के लिए जिला कोषागार कार्यालय पहुंचने लगते हैं। प्रतिदिन बड़ी संख्या में पेंशनर्स कार्यालय पहुंचकर जीवित प्रमाणपत्र जमा कर रहे हैं।
हालांकि इसके लिए उन्हें विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई कर्मचारियों की ड्यूटी पंचायत चुनाव में लगा दी गई है। कर्मचारियों की कमी का खामियाजा पेंशनर्स को प्रमाणपत्र जमा करने में भुगतना पड़ रहा है। सबसे अधिक समस्या शारीरिक रूप से कमजोर लोगों को उठानी पड़ रही है। कार्यालय तक जाने के लिए रैंप की व्यवस्था न होने से पेंशनर्स को सीढ़ी चढ़ने में दिक्कत हो रही है।
वैसे तो प्रमाणपत्र फॉर्म भरने में अधिक समस्या नहीं होती है, लेकिन इसे भरने के लिए भी कार्यालय के आसपास एजेंट सक्रिय हैं। वे फॉर्म भरने के पेंशनर्स से 20 से 30 रुपये ले रहे हैं। एक पेंशनर ने बताया कि इसकी शिकायत उन्होंने संबंधित अधिकारी से की थी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका।
पेंशनर्स को फॉर्म भरने एवं जमा करने में कोई समस्या न हो, इसे लेकर विभागीय अधिकारी कितना गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पेंशनर्स के बैठने के लिए मात्र कुछ कुर्सियां रखी गई हैं। इसके अलावा कक्ष के बाहर दरी बिछा दी गई है। पेंशनर्स की संख्या अधिक होने पर मजबूरन उन्हें दरी पर बैठना पड़ता है। ऐसे में सबसे अधिक समस्या घुटने व कमर दर्द से पीड़ित पेंशनर्स को उठानी पड़ती है।