एक माह में मात्र छह प्रतिशत की खरीद होने से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि फरवरी माह के अंत तक होने वाली खरीद के दौरान लक्ष्य की पूर्ति कैसे व किस हद तक की जा सकेगी।
क्रय केंद्रों पर प्रभारियों की मनमानी के चलते किसानों को मजबूरन अपना धान औने-पौने दामों पर आढ़तियों के हाथों बेचना पड़ रहा है। धान खरीद की धीमी गति के पीछे एक कारण जहां भंडारण की समस्या बताया जा रहा है, वहीं धान की अच्छी उपज का न होना भी इसमें बाधक बन रही है।
किसानों को धान की बिक्री के लिए एक केंद्र से दूसरे केंद्र का चक्कर लगाना पड़ रहा है, लेकिन इसके बाद भी उनका धान नहीं खरीदा जा रहा है। बताते चलें कि विगत वर्ष धान की खरीद जहां अक्तूबर माह से शुरू हुई थी, वहीं इस वर्ष इसकी शुरूआत नवंबर माह से हुई है। किसानों को अपना धान बेचने में किसी प्रकार की समस्या न हो, इसके लिए जिले के विभिन्न क्षेत्रों में छह एजेंसियों के कुल 48 केंद्रों की स्थापना की गई है।
इन सबके बाद भी जिले में धान खरीद का कार्य गति नहीं पकड़ पा रहा है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मार्केटिंग द्वारा 20 हजार मीट्रिक टन लक्ष्य के सापेक्ष 1915.07 मीट्रिक टन, पीसीएफ द्वारा 34 हजार 500 मीट्रिक टन के सापेक्ष 1221.44 एमटी, यूपी स्टेट एग्रो द्वारा एक हजार एमटी के सापेक्ष 56.60 एमटी, यूपीएसएस द्वारा छह हजार एमटी लक्ष्य के सापेक्ष 387.10 एमटी, कर्मचारी कल्याण निगम द्वारा 3500 एमटी लक्ष्य के सापेक्ष 366.60 एमटी व भारतीय खाद्य निगम द्वारा छह हजार मीट्रिक टन के सापेक्ष मात्र 4.28 मीट्रिक टन की खरीद की जा सकी है।
इस प्रकार 65 हजार मीट्रिक टन लक्ष्य के सापेक्ष मात्र 3951.09 मीट्रिक टन धान की ही खरीद अब तक हो सकी है, जो कि लक्ष्य के सापेक्ष मात्र छह प्रतिशत है।