भीटी(अंबेडकरनगर)। क्षेत्र के बढ़ैया में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है। दूसरे दिन शनिवार को कथा प्रवाचक आचार्य कृष्णकांत ने शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग और ध्रुव चरित्र का वर्णन किया।
प्रवाचक ने बताया कि माता सती ने अपने संसार और पति के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाया। विवाह के बाद भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए। उन्होंने 87 हजार वर्ष तक कठिन तपस्या की। कथा में वर्णित है कि जगत और देवताओं के कल्याण के लिए माता सती ने अपने त्याग और तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और पार्वती के रूप में उनका पुनर्जन्म हुआ।प्रवाचक ने कहा कि विवाह एक पवित्र संस्कार है। जीवन में संस्कारों का महत्व अत्यधिक है।
जैसे शरीर के बिना जीवन निरर्थक है, वैसे ही संस्कारों के बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं होता। भगवान ध्रुव के चरित्र का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि ध्रुव ने केवल पांच वर्ष की अवस्था में ईश्वर को प्राप्त किया। जीवन में आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी है। भक्तिभाव में दिखावा नहीं होना चाहिए।
माता पार्वती के हिमालय पर्वत पर जन्म और तपस्या का वर्णन भी हुआ। उन्होंने घोर तपस्या करके भगवान भोलेनाथ का हृदय जीत लिया। भगवान शिव प्रसन्न हुए और पार्वती माता का विवाह शिवजी के साथ संपन्न हुआ। विवाह में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र सहित सभी लोकपाल देवता उपस्थित रहे। हिमालय ने ढोल-नगाड़ों के साथ शिवजी की बरात का स्वागत किया।