अंबेडकरनगर। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) में राशन और स्टेशनरी आपूर्ति के टेंडर को लेकर बेसिक शिक्षा विभाग की लापरवाही फिर सामने आई है। दूसरी बार भी निविदा प्रक्रिया के निरस्त होने से जिले के आठ विद्यालयों में पढ़ने वाली करीब 1,500 छात्राओं के भोजन की व्यवस्था संकट में पड़ गई है। लगभग सात महीने बीत जाने के बाद भी राशन आपूर्ति का टेंडर पूरा न होने के कारण वार्डन को छात्राओं के भोजन के लिए 30 हजार रुपये की आपातकालीन निधि से राशन खरीदना पड़ रहा है।
बेसिक शिक्षा विभाग ने सात जनवरी 2026 को जेम पोर्टल पर खाद्य सामग्री की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किया था। इस टेंडर प्रक्रिया के दौरान जौनपुर की आदिशक्ति इंटरप्राइजेज ने शिकायत की। उन्होंने आरोप लगाया कि चयनित फर्म शक्ति इंटरप्राइजेज बस्ती ने करीब 2.66 करोड़ रुपये की अनुमानित आपूर्ति के मुकाबले महज 22,580 रुपये की दर पर निविदा दाखिल की थी और इसी दर पर उनका चयन भी हो गया था। यह सीधे तौर पर गंभीर अनियमितता का मामला था। शिकायत के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला ने टेंडर निरस्त कर दिया था। इसके साथ ही, अनियमितता के आरोप में तत्कालीन जिला समन्वयक (एमडीएम/बालिका शिक्षा) सत्यप्रकाश मौर्या और एमआईएस कर्मचारी विपुल सिंह का एक महीने का वेतन भी रोक दिया गया था।
टेंडर निरस्त होने के बाद विभाग ने अस्थायी रूप से कोटेशन के माध्यम से राशन आपूर्ति शुरू कराई। इस बीच, विभाग ने दोबारा टेंडर के लिए जेम पोर्टल पर आवेदन किया। लेकिन इस बार राशन, स्टेशनरी और अन्य सामग्री की सूची अलग-अलग डालने के बजाय एक ही श्रेणी में डाल दी गई। जेम पोर्टल ने इसे अनियमितता मानते हुए टेंडर को निरस्त कर दिया है।
तकनीकी चूक या विभागीय लापरवाही?
कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों के टेंडर दूसरी बार निरस्त होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जेम पोर्टल पर आवेदन के दौरान राशन, स्टेशनरी और दैनिक उपयोग की सामग्री को अलग-अलग श्रेणियों में दर्शाने के बजाय एक ही श्रेणी में शामिल कर दिया गया। इसी तकनीकी गलती के कारण पूरी निविदा प्रक्रिया को एक बार फिर रद्द करना पड़ा।
इससे पहले जब अनियमितता का मामला उजागर हुआ था, तब संबंधित समन्वयकों से स्टांप पेपर पर माफीनामा लिया गया था। इसके बाद लालचंद को बालिका शिक्षा का नया जिला समन्वयक तैनात किया गया था। हालांकि, विभागीय सूत्रों का कहना है कि तकनीकी कार्यों के लिए अब भी पूर्व में आरोपी रहे विपुल सिंह की ही मदद ली जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की खरीद प्रक्रिया में इतनी बुनियादी और बड़ी गलती कैसे हो गई और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया?
नहीं मिल पा रहा मेन्यू के अनुसार भोजन
नया सत्र शुरू होने से पहले टेंडर प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी टेंडर अधर में है। अब नए सिरे से टेंडर कराने में लगभग एक महीने का समय और लग जाएगा।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, हर केजीबीवी में भोजन आदि पर प्रति माह करीब 1.25 से 1.50 लाख रुपये का खर्च आता है। इसके मुकाबले अब सिर्फ 30 हजार रुपये में काम चलाया जा रहा है। ऐसे में छात्राओं को न तो तय मेन्यू के अनुसार भोजन मिल पा रहा है और न ही उनकी अन्य जरूरतें पूरी हो पा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि जैसे-तैसे केवल काम चलाया जा रहा है।
वर्जन
जेम पोर्टल में तकनीकी खामियों के कारण टेंडर प्रक्रिया एक बार फिर निरस्त हो गई है। जल्द ही संशोधित निविदा जारी कर राशन आपूर्ति की नियमित व्यवस्था बहाल की जाएगी।
- डॉ. पूनम मिश्रा, बीएसए