आलापुर। मान्यताओं के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर ने राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। इसी खुशी में देवताओं ने इस दिन स्वर्ग लोक में दीपक जलाकर खुशी मनाई गई थी। इसके बाद से ही प्रत्येक वर्ष इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाता है। यह विचार सनातन वैदिक आश्रम के आचार्य पंडित आशुतोष शुक्ल ने बुधवार को प्रकट किया।
आचार्य ने बताया कि दीपावली के पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली का पर्व मनाया जाता है। हर त्योहार की तरह यह त्योहार भी कई राज्यों में मनाया जाता है। इस मौके पर मां गंगा की विधिवत पूजन होती है। ऐेसे मौके पर मां गंगा के तट का नजारा बेहद अद्भुत होता है क्योंकि देव दीपावली के मौके पर दीए जलाकर गंगा नदी के घाटों को रोशन किया जाता है। उन्होंने बताया कि इस त्योहार को लेकर यह भी मान्यता है कि इस दिन देवता पृथ्वी पर आते हैं। इस माह में ब्रम्हा, विष्णु, शिव, अंगिरा आदि ने महापुनीत पर्वों को प्रमाणित किया है। इसके चलते कार्तिक पूर्णिमा के पूरे माह को पवित्र माना जाता है। देव दीपावली के मौके पर होने वाले शुभ कार्यों के बारे में बताते हुए कहा कि इस दिन गंगा स्नान का बहुत महत्व है।
साथ ही घरों में तुलसी के समक्ष दीपक जलाना भी बहुत शुभ माना जाता है। देव दीपावली के दिन दीये दान करना शुभ का संकेत माना जाता है। आचार्य ने बताया कि जो लोग इस दिन पूरब की तरफ मुंह करके दीये दान करते हैं। उन पर ईश्वर की कृपा होती है। मान्यता है कि ऐसे लोगों को ईश्वर लंबी आयु का वरदान देते हैं। साथ ही घर में सुख एवं शांति का माहौल बना रहता है। आचार्य ने बताया कि सनातन वैदिक आश्रम देवभूमि नयागांव द्वारा सरयू नदी के किनारे घाट पर विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी देव दीपावली का आयोजन होगा, जिसकी तैयारियां जोरों पर है।