हजपुरा। जब रमजान का महीना शुरू होता है तो जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। यह नेकियों का महीना है, जिसमें मुस्लिम रोजा रखने के अलावा कुरान की तिलावत पूरी मेहनत से करते हैं। माना जाता है कि रोजेदार जितना कुरान पढ़ेंगे, उतना पुण्य होगा, गुनाह माफ़ होंगे और जन्नत के हकदार बनेंगे। रोजे 30 दिन के भी हो सकते हैं और 29 दिन के भी। ये बात भी चांद पर ही निर्भर करती है कि वह कब अपना दीदार कराता है। जिस रात को चांद दिखता है उससे अगली सुबह ईद का दिन होता है। पाक क़ुरान जो मुस्लिमों का धर्मग्रंथ है, वह भी इसी महीने में उतरा। यह बातें अर्शी मौलाई ने सोमवार को आयोजित मजलिस में कहीं।
उन्होंने कहा कि ये वह महीना है, जब इंसान अल्लाह के करीब आ जाता है। क्योंकि वह नेक अमल अंजाम देता है। गुनाहों से बचने की कोशिश करता है, क्योंकि झूठ बोलने से भी रोजा नहीं होता। ऐसे में मुसलमान चाहता है कि जब वह पूरे दिन भूखा-प्यासा रहा ही है, तो क्यों न उसका रोजा भी पूरा हो जाए।
रोजेदार के सामने कुछ भी नहीं खाना चाहिए। मौलाना अर्शी ने बताया कि रमजान का महीना रोजेदारों के लिए आत्म नियंत्रण और संयम का महीना माना जाता है। इस महीने की गईं नेकियों का फल जल्दी मिलता है। रमजान का ये महीना मुसलमानों को खुद पर नियंत्रण रखने की सीख देता है। इस वजह से ये बात सही है कि रोजेदारों के सामने कुछ खाना नहीं चाहिए।