बसखारी। व्यापारी नेता की हत्या के पीछे जिस विद्यालय प्रबंधक व उनके परिवारीजनों का नाम सामने आया है, उसके विरुद्ध व्यापारी नेता रामचंदर जायसवाल लगातार आवाज उठा रहे थे। भ्रष्टाचार व गड़बड़ी की तमाम शिकायतों पर जांच के चलते विद्यालय पर आंच आने लगी थी। विद्यालय प्रबंधन व बसपा नेता के बीच खाई इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि समूचे क्षेत्र में दोनों के बीच तनातनी की चर्चाएं लंबे समय से थीं। खास बात यह कि बसपा नेता की शिकायत पर एक टीम गुरुवार को ही विद्यालय में जांच करने पहुंची थी। इसके 24 घंटे के भीतर ही बसपा नेता की हत्या हो गई।
गौरतलब है कि बसपा नेता की हत्या के बाद परिवारीजनों ने जिस शिवप्रकाश मौर्य को मुख्य रूप से नामजद किया है, वह एक शिक्षण संस्थान का प्रबंधक है। इसी शिक्षण संस्थान के विरुद्ध लंबे समय से बसपा नेता रामचंदर जायसवाल कई शिकायत करते आ रहे हैं। इसमें छात्रवृत्ति में धांधली, गलत ढंग से सांसद व विधायक निधि का लाभ लेने आदि का मामला शामिल है। शिकायतों को लेकर हुई जांच में कई आरोपों की पुष्टि हुई, जिसके बाद विद्यालय पर कार्रवाई की तैयारी शुरू हो चुकी हैै।
इसी बीच शिकायतों के क्रम में जिलास्तर से एक टीम जांच के लिए गुरुवार को भी विद्यालय पहुंची थी। इन्हीं सब को लेकर बसपा नेता व विद्यालय प्रबंधन के बीच तनातनी की स्थिति थी। शिक्षण संस्थान के विरुद्ध शिकायतों के शुरुआती दौर में ही बसपा नेता पर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए बसखारी थाने में केस तक दर्ज हो गया था। इसमें किसी तरह वे जेल जाने से बच पाए थे। इसके बाद तनातनी की स्थिति और बढ़ गई। इस बीच शुक्रवार को उनके साथ अंतत: हादसा हो ही गया। परिवारीजनों ने इन्हीं सब के चलते संस्थान प्रबंधक आदि पर केस दर्ज कराया है।
बताया जाता है कि पूरे घटनाक्रम की शुरुआत रामचंदर जायसवाल के परिवार की उस राइसमिल से जुड़ी है, जिसकी शिकायत उस विद्यालय प्रबंधक के परिजनों की तरफ से हुई थी, जिन्हें अब इस हत्याकांड में नामजद किया गया है। बताया जाता है कि राइस मिल के बगल ही संबंधित शिक्षण संस्थान स्थित है। जिसके संचालकों द्वारा राइस मिल से प्रदूषण आदि को लेकर शिकायतें की जाने लगीं। इसी से विवाद की शुरुआत हुई। इसमें शिकायत के चलते ही राइस मिल का संचालन प्रभावित हो गया।
इसके बाद ही बसपा नेता ने अपना ध्यान विद्यालय की तरफ केंद्रित कर दिया। शुरुआती दौर में अधिकारियों से शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने आरटीआई का सहारा लेना शुरू कर दिया। इसमें भी उन्हें काफी मुश्किलें हुई, लेकिन उन्होंने न हिम्मत हारा न पीछा छोड़ा। नतीजा यह कि विद्यालय के ऊपर कई तरफ से कार्रवाई की तलवार लटकने लग गई थी।