अंबेडकरनगर। तमाम कद्दावर नेताओं द्वारा साथ छोड़ जाने के बीच गढ़ में लाज बचाने की चुनौती से बसपा शनिवार को जूझती दिखी। कभी जिले के पार्टी कार्यकर्ताओं व समर्थकों के बूते ही शिवबाबा मैदान को भर देने वाली बसपा को अब मंडल स्तरीय रैली कर भीड़ जुटानी पड़ी। इसमें अंबेडकरनगर के अलावा अन्य जनपदों के कार्यकर्ता, समर्थक व प्रत्याशी पहुंचे। विधानसभा चुनाव में ऐसा पहली बार हुआ है, जब बसपा को यहां अन्य जनपदों का भी सहारा लेना पड़ा। इसके जरिए बसपा भीड़ जुटाने में कामयाब तो जरूर रही, लेकिन इस रैली ने कई गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। हालांकि रैली में पहुंचे कार्यकर्ता व समर्थक पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की एक झलक पाने तथा उन्हें अपने मोबाइल में कैद कर लेने को बेताब जरूर दिखे।
लंबे समय तक बसपा के गढ़ के तौर पर पहचान बनाए रखने वाले इस जनपद में बसपा को अब बड़ी भीड़ जुटाने की चुनौती से जूझना पड़ा है। 29 सितंबर 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उस समय के संयुक्त जनपद फैजाबाद को विभक्त कर जब पवित्र शिवबाबा मैदान में अंबेडकरनगर नाम से नया जनपद बनाने की घोषणा की थी तो उस रैली ने भीड़ का नया इतिहास रच दिया था। इसके बाद भी हुई मायावती की रैली में अपार भीड़ देखने को मिलती रही है। हालांकि बीते पांच वर्षों के दौरान जिले में बसपा की स्थिति तेजी से बदली है।
वर्ष 2017 के चुनाव के बाद से आलापुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले कद्दावर दलित नेता पूर्व सांसद त्रिभुवनदत्त पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए। कटेहरी विधायक पूर्व मंत्री लालजी वर्मा व अकबरपुर विधायक पूर्व मंत्री रामअचल राजभर को पार्टी से निकाल दिया गया। वे दोनों भी सपा में शामिल हो गए।
जलालपुर का प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व सांसद राकेश पांडेय भी बसपा छोड़कर सपा के हमराह हो गए। यह चारों नेता बसपा के कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटाने के लिए जाने जाते थे। अब इन सभी के बसपा में न होने के बाद शनिवार को रैली में भीड़ जुटाना बसपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। सभी पांच सीटों के मौजूदा बसपा प्रत्याशियों ने हालांकि भीड़ के लिए पूरी ताकत लगा रखी थी, लेकिन पार्टी कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं थी।
नतीजा यह हुआ कि विधानसभा चुनाव के इतिहास में बसपा ने पहली बार जिले में पार्टी प्रमुख मायावती की रैली को मंडलीय रैली का दर्जा दे दिया। पहले की रैलियों में जिले के अलग-अलग क्षेत्रों के ही कार्यकर्ता व समर्थक बड़ी तादाद में पहुंच कर भारी भीड़ का नजारा उत्पन्न कर देते थे। चार प्रमुख नेताओं के बसपा से बाहर जाने का संदेश गलत न जाए, इसके लिए अयोध्या मंडल के तमाम जिलों के प्रत्याशियों को उनके समर्थकों समेत इस रैली में आना पड़ा। बाकायदा दूसरे जिले के पार्टी प्रत्याशियों को इस जिले के प्रत्याशियों के साथ अलग-अलग मंच पर विशेष स्थान दिया गया। पार्टी की पूरी कोशिश थी कि भीड़ के मामले में चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया जा सके। मंडलीय रैली का दर्जा देने तथा कई जिलों से कार्यकर्ताओं व नेताओं के आने के चलते भीड़ तो जरूर हो गई, लेकिन आमतौर पर पिछली रैलियों में दिखने वाला रेला इस बार नजर नहीं आया।
पूर्व की रैलियों में शिवबाबा की तरफ नगर से आगे बढ़ते ही जाम की स्थिति उत्पन्न हो जाया करती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिखा। पहले की रैलियों के दिन सुबह से ही अकबरपुर नगर के अलग-अलग मार्गों से भीड़ गुजरती दिखने लगती थी। इस बार सुबह 10 बजे तक भीड़ न दिखने से रैली की सफलता को लेकर सोशल मीडिया तक पर प्रतिकूल चर्चाएं देखने को मिलीं। एक बार तो यह लगा कि शायद बसपा की यह रैली पार्टी के लिए गलत संदेश न दे जाए, लेकिन दोपहर होने तक पार्टी के लिए सुकून वाली स्थिति हो गई।
हालांकि इन सबके बावजूद जिस तरह पार्टी को इस बार मंडल स्तरीय रैली करनी पड़ी, उस पर भी पुरानी रैलियों जैसी भीड़ नहीं दिखी, तो इससे कई तरह की चर्चाएं होने के साथ ही तमाम गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। हालांकि बसपा जिलाध्यक्ष अरविंद गौतम का दावा है कि रैली ऐतिहासिक थी। कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए ही विशेष प्रबंध नहीं किए गए थे। तमाम कार्यकर्ता खुद के साधनों से पहुंचे थे। इसके बाद भी भीड़ देखकर विपक्षी दलों को नतीजों का एहसास हो गया होगा।