अंबेडकरनगर। जिला पंचायत के ढाई दशक लंबे इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि बसपा अध्यक्ष पद कुर्सी पाने की प्रतिष्ठित जंग में शामिल नहीं होगी। बसपा के गढ़ माने जाने वाले जिले में अब तक कुल 6 बार जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव हुए हैं। इन सभी में बसपा पूरी मजबूती से अपनी दावेदारी पेश करती नजर आयी। इसी कारण सर्वाधिक 4 बार बसपा का ही प्रत्याशी अध्यक्ष पद पर कब्जा रहा है। इस बार के चुनाव में बसपा ने मैदान में न उतरने का फैसला कर सभी को चौका दिया है।
29 सितंबर 1995 को मिले जनपद के दर्जा बाद जिला पंचायत का गठन वर्ष 1996 में हुआ। इसके बाद अध्यक्ष के चुनाव का सिलसिला शुरू हुआ। बसपा प्रमुख मायावती ने मुख्यमंत्री के तौर पर जिले की स्थापना अंबेडकरनगर नाम से की थी। जनता ने भी सभी तरह के चुनाव में बसपा को हाथों हाथ ले कर बसपा पर पूरा भरोसा दिखाया था। इसी कारण धीरे धीरे यह जिला पूरे प्रदेश में बसपा के गढ़ के तौर पर पहचाना जाने लगा।
बसपा की लोकप्रियता का अनुमान इसी से दिखता था कि बसपा सुप्रीमो मायावती खुद यहां से लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने आई थीं। मायावती ने भी अपने मंत्रिमंडल में हमेेशा इस जनपद को प्राथमिकता पर रखा। बसपा का दबदबा होने के कारण ही जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में भी उसका दम देखने को मिलता रहा।
हालांकि 1996 में हुए पहले चुनाव में बसपा को सफलता नहीं मिली लेकिन उसने दमदार प्रदर्शन किया। पहले चुनाव में भाजपा नेता रमाशंकर सिंह की पत्नी भारती सिंह की पत्नी विजयी रहीं। वर्ष 2000 में दूसरी बार हुए चुनाव में बसपा ने कोई चूक नहीं की। बसपा नेता त्रिभुवन दत जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा करने में सफल रहे। वर्ष 2002 में हुए उपचुनाव में भी बसपा प्रत्याशी के तौर पर पार्टी नेता बजरंगबली को जीत मिली।
इसके बाद वर्ष 2006 में फिर से जिपं अध्यक्ष पद की जंग में प्रमुख राजनीतिक दल आमने सामने हुए। इसमें भी बसपा प्रत्याशी सुधा वर्मा ने आसानी से जीत हासिल कर ली। वर्ष 2011 के चुनाव में बसपा के कद्दावर नेता रहे (अब निष्कासित) लालजी वर्मा की पत्नी शोभवती वर्मा ने धमाकेदार जीत दर्ज कर ली।
वर्ष 2016 के अगले चुनाव में बसपा प्रत्याशी के तौर पर एक बार फिर शोभावती जीत को लेकर आश्वस्त थीं लेकिन धांधली के आरोपों को लेकर हुए तमाम हंगामे के बीच उन्हें पराजित घोषित कर दिया गया था। ऐसे में जनपद गठन के बाद से अब तक जिपं अध्यक्ष पद के लिए कुल 6 बार चुनाव हुए। इनमें से 4 बार बसपा ने जीत हासिल कर अपना दबदबा कायम रखा।
अब इस बार यह पहला मौका है जब बसपा ने खुद को जिला पंचायत अध्यक्ष की चुनावी जंग से बाहर रखा है। निश्चित रूप से बसपा के लिए यह बड़ा सबक है कि वह अपने ही गढ़ में प्रत्याशी उतारने की स्थिति में नहीं रह गयी है। सूत्रों का कहना है कि बसपा ने जिस प्रत्याशी पर अध्यक्ष पद के लिए दांव लगाया था उसे सदस्य पद के ही चुनाव में सफलता नहीं मिल पाई।