टांडा (अंबेडकरनगर)। अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन से ही मास्टर साहब की उपाधि से विभूषित किए गये जयराम वर्मा हमारे बीच नहीं हैं। हालांकि उनका दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व, साधारण जीवन शैली, गांधीवादी विचारधारा मौजूदा समय में भी युवा पीढ़ी के लिये अत्यंत प्रेरक है। जयराम वर्मा जैसे व्यक्ति विरले ही होते हैं, जो स्वहित से ऊपर उठ कर समाज और राष्ट्र के लिये न्यौछावर होते हैं। वे एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने दबे, कुचले एवं पिछडों के लिए जीना स्वीकार किया था। स्वार्थी, अपराधी, भ्रष्टाचारी से उन्हें सख्त नफरत थी। 20 वर्षों तक विधायक, मंत्री, सांसद होने के बावजूद उनके पास पैतृक घर के अलावा कुछ भी नहीं रहा। उन्होंने राजनीति के माध्यम से न सिर्फ जनता की सेवा की, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में स्कूल कॉलेज खोलकर बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने का भी प्रयास किया।
सरल, सादगी, सुचिता से परिपूर्ण किसान के इस बेटे का जन्म टांडा तहसील क्षेत्र के ग्राम बड़ागांव इब्राहिमपुर की धरती पर नन्हकू चौधरी के घर 4 फरवरी 1904 को हुआ था। इनकी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीणांचल स्थित प्राथमिक पाठशाला पहाड़पुर से, मिडिल जूनियर हाईस्कूल अकबरपुर से, हाईस्कूल व इंटरमीडियट की परीक्षा राजकीय इंटर कॉलेज फैजाबाद से प्रथम श्रेणी में पूरी हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1932 में गणित से एमए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उस समय जयराम वर्मा के सामने बहुत सारी राजकीय सेवाएं थी, परंतु देश व समाज के उत्थान के लिए उन्होंने राजकीय सेवा को न स्वीकर करते हुए होबर्ट त्रिलोकनाथ इंटर कॉलेज टांडा में 1936 में शिक्षक पद को स्वीकार किया। उनका विवाह अध्ययनकाल में ही प्राणदेवी के साथ हुआ। उनसे दो संतानें एक पुत्र कमला प्रसाद वर्मा एवं पुत्री साबित्री देवी हुईं।
जयराम वर्मा का जीवनकाल कठिनाइयों से भरा रहा। उसके बाद भी धैर्यपूर्वक सभी कठिनाइयों और दुखों को सहते हुए कर्तव्य पथ से कभी विचलित नहीं हुए। महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित होकर वर्ष 1941 में रामबली नेशनल हाईस्कूल गोशाईगंज से शिक्षक पद को त्याग कर स्वतंत्रता संग्राम के सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े। इसमें उन्हें 3 माह 21 दिन कारावास और 100 रुपये जुर्माना हुआ। वर्ष 1942 से 1945 के आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें पुन: 1 वर्ष 3 माह 15 दिन जिला जेल फैजाबाद एवं सेंट्रल जेल वाराणसी में रखा गया। इस बीच उनकी धर्म पत्नी का स्वर्गवास हो गया। फिर भी वे अपने कर्त्तव्य पथ पर निरंतर बढ़ते रहे।
सर्व प्रथम वर्ष 1946 में विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 1952, 57, 62, 67 के सामान्य निर्वाचनों में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर विधानसभा के सदस्य निर्वाचित होते रहे। वर्ष 1959 में डॉ. संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में उपमंत्री और चंद्रभान गुप्ता व सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्व काल में उपमंत्री (वित्त एवं न्याय) रहे। चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में बनी संविदा सरकार में कृषि, सामुदायिक विकास, पंचायती राज एवं गन्ना विकास मंत्री बने। वर्ष 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें नेशनल सीड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया और गवर्नमेंट फार्म का सभापति मनोनीत किया।
वर्ष 1980 के लोकसभा के सामान्य चुनाव में फैजाबाद संसदीय क्षेत्र से सासंद चुने गये। वर्ष 1985 के सामान्य विधानसभा चुनाव में वे पुन: टांडा से विधायक निर्वाचित होकर नारायण दत्त तिवारी के मंत्रिमंडल में नियोजन मंत्री बने। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त कर दिया, लेकिन विधानसभा क्षेत्र टांडा के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए राज्यपाल के पद को स्वीकार न करते हुए जनसेवा करने का संकल्प लिया। वर्ष 1986 में सार्वजनिक उपक्रम एवं सयुंक्त निगम समिति के सभापति भी रहे।
शिक्षा के क्षेत्र में जयराम वर्मा का योगदान सराहनीय रहा। वे बापू स्मारक इंटर कॉलेज व जयराज वर्मा जूनियर हाईस्कूल नाऊसांडा, सर्वोदय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कोटवा मोहम्मद पुर के संस्थापक और कामता प्रसाद सुंदर लाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय अयोध्या के आजीवन अध्यक्ष रहे। 1968 में भारत सरकार के आमंत्रण पर कृषि एवं सहकारिता संबंधी अध्ययन के लिये संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और 1982 में राजभाषा समिति की तरफ से सरकारी कार्यों में हिंदी भाषा के प्रयोग के संबंध में अध्ययन के लिए जर्मनी, फ्रांस, हालैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा एवं ग्रेट ब्रिटेन भी गए। 13 जनवरी 1987 की रात अपने पार्थिव शरीर को त्याग दिया।