अंबेडकरनगर। जिले में मनरेगा पूरी तरह धराशायी होकर रह गई है। आलम यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 27 हजार 339 जाबकार्डधारकों को योजना के तहत काम दिए जाने का लक्ष्य था लेकिन मात्र चार हजार 956 को ही रोजगार दिया जा सका है। इतना ही नहीं, 17 करोड़ 18 लाख 253 रुपये खर्च करने के सापेक्ष अब तक मात्र छह करोड़ 54 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। नतीजतन योजना के तहत रोजगार दिए जाने को लेकर जहां संबंधित अधिकारी व कर्मचारी लापरवाह बने हुए हैं, वहीं समय पर मजदूरी न मिलने के चलते इससे जाबकार्डधारकों का भी मोहभंग होने लगा है। इसी का नतीजा है कि ज्यादातर ग्राम पंचायतों में योजना के तहत विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े हैं।
शहरों की तरफ हो रहे पलायन को रोकने एवं गांव में ही 100 दिन का रोजगार दिए जाने की योजना मनरेगा मौजूदा समय में जिले में पूरी तरह धराशायी होकर रह गई है। विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की लापरवाही के चलते इसका समुचित लाभ पात्रों को नहीं मिल पा रहा है। कभी मजदूरी भुगतान योजना में बाधा पैदा करती है, तो कभी संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा अपने चहेतों को रोजगार उपलब्ध कराने की शिकायतें सामने आती हैं। इसकी शिकायतें अक्सर तहसील दिवसों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक से होती हैं लेकिन इस तरफ कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है। नतीजतन योजना को लेकर लापरवाही बरकरार है। इसका खामियाजा जाबकार्डधारकों को भुगतना पड़ रहा है। मनरेगा मजदूरों की मानें, तो मनमानी के चलते अब उनका योजना से मोहभंग होने लगा है।
योजना के तहत जाबकार्डधारकों को रोजगार दिलाने को लेकर विभागीय अधिकारी कितना गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चालू वित्तीय वर्ष में अब तक मात्र चार हजार 356 जाबकार्डधारकों को ही रोजगार दिया जा सका है। यदि लक्ष्य की बात की जाए तो यह 27 हजार 339 का था। योजना को लेकर किए जाने वाले खर्च में भी संबंधित अधिकारियों की लापरवाही बरकरार रही। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में अब तक 17 करोड़ 18 लाख 253 रुपये खर्च किए जाने का लक्ष्य था, लेकिन मात्र छह करोड़ 54 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं। जलालपुर के जाबकार्डधारक झिनकू व लंबू ने बताया कि पहले तो फिर भी समय से मजदूरी का भुगतान हो जाया करता था लेकिन जब से नई प्रथा शुरू हुई है, तब से इसमें काफी देर हो जाती है। कभी-कभी तो 15 से 20 दिन लग जाता है। ऐसे में उन्हें दूसरा कार्य करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।