अंबेडकरनगर। यूकेलिप्टस की खेती कर मोटा मुनाफा कमाने की आस लगाए किसानों को अब तगड़ा झटका लग रहा है। अधिकांश किसानों ने हाइब्रिड प्रजाति के यूकेलिप्टस के पौधे लगाए थे। बड़े होकर तैयार होने के बावजूद एक तरफ जहां किसानों को इन पेड़ों के मुकाबले पर्याप्त दाम नहीं मिल रहा, वहीं उपजाऊ मिट्टी को बंजर भी बना बैठे। ऐसे में किसान खुद का ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
करीब एक दशक पहले जिले में लकड़ी तैयार करने और उसकी बिक्री कर मोटी कमाई के लालच में किसानों का रुझान यूकेलिप्टस की तरफ हुआ था। कारण यह कि सामान्य पौधे जहां 15 से 20 वर्ष में उपयोग के लायक होते हैं, वहीं यूकेलिप्टस महज 5 से 7 वर्ष में तैयार हो जाता है। इसके चलते किसानों ने कम लागत व कम समय में बेहतर कमाई का माध्यम चुन लिया।
5 से 10 रुपए में नर्सरी से पौध लेकर हजारों की संख्या में पौध लगा दी। करीब एक दशक पहले तैयार पेड़ की मोटाई आदि के अनुसार 1500 रुपए से 2 हजार रुपए तक प्रति पेड़ मिल जाता था। किसानों को लगा कि 10 रुपए का पेड़ 7 वर्ष में यदि 1500 रुपए देता है तो उन्हें परंपरागत खेती करने की क्या जरूरत है। कई किसानों ने बड़े पैमाने पर इसे अपने उपजाऊ खेतों में रोप दिया।
किसानों के बीच इस पौध को लगाने की ऐसी होड़ मची कि गांव-गांव तमाम लोग यूकेलिप्टस लगाने की होड़ में शामिल हो गए। अधिक रोपाई का आलम यह रहा कि उत्पादन ज्यादा हो गया। ऐसे में 1500 से दो हजार रुपए में बिकने वाले पेड़ों के लिए कोई 500 से 700 रुपए भी देने को तैयार नहीं है। अब किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।
वाजिब मूल्य न मिल पाने की बात तो दूर किसानों ने यूकेलिप्टस के चक्कर में अपने खेत की उपजाऊ मिट्टी भी बर्बाद कर दी। जिला कृषि अधिकारी डॉ. धर्मराज सिंह की मानें तो यूकेलिप्टस सामान्य जलवायु वाले क्षेत्रों में अभिशाप है। यूकेलिप्टस जलीय पौधा है। यहहां अधिक नमी व दलदलीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। एक यूकेलिप्टस प्रतिदिन 150 से 200 लीटर पानी अवशोषित करता है। इसकी जड़े भूमि में काफी गहराई तक जाती हैं। इससे यह मिट्टी में मौजूद उर्वरा शक्ति को खींच लेता है। यूकेलिप्टस का एक पौधा लगा है तो कम से कम चारों तरफ 10 फीट की दूरी में दूसरा पौधा नहीं तैयार हो सकता। इस क्षेत्र की मिट्टी पूरी तरह बंजर बन जाती है।
लोगों को यूकेलिप्टस का रोपण नहर, नाला या फिर जहां पर पानी की अधिक मात्रा हो वहीं पर करना चाहिए। सामान्य स्थानों पर करने पर इसका प्रतिकूल असर न सिर्फ मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर पड़ता है, बल्कि जलस्तर भी घटता है। कारण यह है कि यूकेलिप्टस को पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। बारिश कम होने पर यह आवश्यकतानुसार पानी अवशोषित करता है। इससे जल स्तर में कमी आती है।
- गंगाराम, प्रभागीय वनाधिकारी