अंबेडकरनगर। छात्र छात्राओं की सुरक्षा जिले में ताक पर है। छोटे बड़े सभी वाहनों में ठूंस-ठूंसकर बच्चे ढोए जा रहे हैं। क्षमता से तीन से चार गुना अधिक बच्चों को प्रतिदिन स्कूल लाने व ले जाने का काम हो रहा है। नौनिहालों की जिंदगी से खिलवाड़ करते हुए ऐसे स्कूल वाहन बेधड़क होकर सड़क पर दौड़ रहे हैं। जिले में लगभग 700 छोटे बड़े स्कूली वाहन सड़कों पर प्रतिदिन दौड़ते हैं। हालांकि इनमें से लगभग साढ़े तीन सौ का ही स्कूल वाहन के तौर पर आंकड़ा परिवहन कार्यालय के पास है। खास बात यह कि स्कूल वाहनों में शामिल ज्यादातर वैन व टैंपो कामर्शियल श्रेणी के हैं, लेकिन वे भी बच्चों को ढोने में लगे हैं। प्रशासन व परिवहन विभाग ऐसे वाहनों या फिर स्कूल प्रबंधनों पर अंकुश लगा पाने में नाकाम दिख रहा। ऐसे में किसी दिन बड़े हादसे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सरकार के तमाम दिशा-निर्देश एक तरफ, जबकि जिले में स्कूली बच्चों को ढोने के मामले में मनमानी दूसरी तरफ है। राज्य सरकार के शुरुआती दिशा निर्देशों के बाद कुछ अवधि को छोड़ दिया जाए, तो यहां छात्र-छात्राओं को वाहनों से ढोने के मामले में लंबे समय से मनमानी बरकरार है। सुरक्षा के मानकों को ताक पर रखकर स्कूली वाहनों से बच्चों को घर से स्कूल लाने व ले जाने का काम रहा है। स्कूली बच्चों को ढोने के लिए जिले में लगभग 700 छोटे बड़े स्कूल वाहन लगे हुए हैं। यह बात अलग है कि परिवहन विभाग के पास 355 स्कूल वाहनों का ही आंकड़ा है। जाहिर तौर पर अन्य वाहन मनमाने ढंग से चल रहे हैं। जिन वाहनों का पंजीकरण स्कूल वाहन के तौर पर परिवहन विभाग के पास है, वे भी जमकर ओवरलोडिंग कर रहे। जबकि जो वाहन कामर्शियल श्रेणी के तौर पर दर्ज हैं, उनकी मनमानी और भी ज्यादा है।
वाहनों में अधिक से अधिक छात्र-छात्राओं को बैठाया जा सके, इसके लिए विभिन्न प्रकार के उपाय किए जाते हैं। दो सीटों के बीच में या तो स्टूल या फिर बेंच लगा दिया गया है। क्षमता से अधिक होने के चलते बसों में बच्चों को खड़ा भी रहना पड़ता है। मानक की किस प्रकार अनदेखी की जाती है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आटो रिक्शे में 18 से 20 बच्चों को बैठाया जाता है जबकि उसकी कुल क्षमता अधिकतम 6 की है। यहीं हालत बसों व वैन का भी है। खास बात यह है कि ऐसे वाहनों पर विभाग द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई की सुध नहीं है।
नहीं है एलपीजी पंप, फिर भी गैस से चलते वाहन
जिले में कोई भी एलपीजी पंप नहीं है। इसके बाद भी स्कूली बच्चों को ढोने में लगी कई वैन चोरी छिपे एलपीजी से ही चल रही हैं। नियमों के अनुसार यह अवैध कृत्य है, लेकिन एलपीजी से चलने वाले किसी भी स्कूल वाहन के विरुद्ध लंबे समय से कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है। इसी का फायदा उठाते हुए एलपीजी से तमाम वैन चल रही हैं। चिंताजनक बात तो यह कि चोरी चुपके एलपीजी से चलने वाले ऐसे वाहनों के पास आग से बचाव के साधन भी नहीं रहते।
अभिभावकों ने जताई नाराजगी
नौनिहालों की जिंदगी खतरे में डालकर सड़कों पर दौड़ रहे ज्यादातर स्कूली वाहनों के विरुद्ध विभाग द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई न किए जाने पर अभिभावकों ने कड़ी नाराजगी जताई। अकबरपुर के शहाब परवेज व अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि वे पहले अपने बच्चों को स्कूली वैन से भेजते थे। मानक से अधिक बच्चों को बैठाने पर वे अब अपने बच्चों को खुद ही घर से स्कूल लाते ले जाते हैं। कहा कि ऑटो व वैन में आमने-सामने की सीट के बीच बेंच रख दिया जाता है। इससे ज्यादा से ज्यादा बच्चों को बैठाया जाता है। जलालपुर के संतोष व अर्जुन ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सड़क पर दौड़ रहे ज्यादातर स्कूली वाहन जर्जर हो चुके हैं। इनके विरुद्ध कार्रवाई को लेकर विभाग गंभीर नहीं हो रहा है। यह संयोग ही है कि जिले में कोई बड़ी घटना नहीं हुई।
समय-समय पर चलाया जाता है अभियान
स्कूली वाहनों के विरुद्ध भी समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। मानक से अधिक बच्चों को बैठाने वाले वाहन के विरुद्ध कार्रवाई भी की जाती है। -केएन सिंह, एआरटीओ