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World Sparrow Day : आंगन सूने, छतें खामोश, यादों में सिमटती जा रही गौरैया

Fri, 20 Mar 2026 03:24 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

कभी सुबह की शुरुआत घर के आंगन में चहचहातीं गौरैया की आवाज से होती थी। खिड़कियों के पास रखे दाने चुगतीं नन्ही चिड़िया हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करती थीं। लेकिन, आज यही गौरैया धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से गायब होती जा रही हैं।
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गौरैया दिवस। - फोटो : एआई।
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विस्तार
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कभी सुबह की शुरुआत घर के आंगन में चहचहातीं गौरैया की आवाज से होती थी। खिड़कियों के पास रखे दाने चुगतीं नन्ही चिड़िया हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करती थीं। लेकिन, आज यही गौरैया धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से गायब होती जा रही हैं। विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने इस पक्षी की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है। गौरैया को वैज्ञानिक भाषा में पासर डोमेस्टिकस कहा जाता है।

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यह चिड़िया सदियों से मानव जीवन के साथ जुड़ी रही है। घरों के रोशनदान, खपरैल और छतों के कोनों में बने इसके घोंसले न केवल घरों में रौनक भरते थे, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक भी थे। आंगन में बैठकर गौरैया को दाना खिलाना और उसकी चहचहाहट सुनना आज सिर्फ याद बनकर रह गया है।

मौसम का सटीक संकेत देती है गौरैया

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जंतु विभाग की डॉ. ऋतु मिश्र के अनुसार गौरैया एक बायो-इंडिकेटर पक्षी है। यह मौसम में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को पहले ही भांप लेती है। इसके व्यवहार से बारिश या तापमान में परिवर्तन का अंदाजा लगाया जा सकता है। साथ ही यह छोटे-छोटे कीटों को खाकर फसलों की रक्षा करती है, जिससे कीटनाशकों की आवश्यकता कम हो जाती है।पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे की घंटी ः सीएमपी डिग्री कॉलेज के डॉ. दीपक कुमार गोंड का कहना है कि गौरैया की संख्या में कमी आना केवल एक पक्षी का लुप्त होना नहीं बल्कि पर्यावरण असंतुलन का भी संकेत है। यदि इसकी संख्या लगातार घटती रही तो इसका सीधा असर पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा।
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इसलिए घट रही है गौरैया की संख्या

विशेषज्ञों के अनुसार गौरैया की संख्या तेजी से कम होने के पीछे कई ठोस कारण हैं। सबसे बड़ा कारण बदलती निर्माण शैली है। पहले घरों में रोशनदान, खुले कोने और खपरैल होते थे, जहां यह आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब कंक्रीट और कांच की इमारतों में इसके लिए जगह नहीं बची है। इसके अलावा मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन गौरैया के प्रजनन और जीवनचक्र को प्रभावित करता है। बढ़ता वायु प्रदूषण और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग इनके भोजन को खत्म कर रहा है। शहरों में कबूतरों की बढ़ती संख्या के कारण भोजन और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है, जिससे यह नन्ही चिड़िया पीछे छूटती जा रही है। 

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