सुनी हुई बातों को दोहराना
सिविल लाइंस निवासी छह वर्षीय बच्चे को ठीक से बोलना नहीं आता था। वह केवल इकोलालिया (सुनी हुई बातों को दोहराना) करता था। उसमें समझ की कमी, हाइपरएक्टिविटी, बार-बार मेल्टडाउन और बहुत कम धैर्य जैसी चुनौतियां थीं। ऐसे में वन चाइल्ड-वन थेरेपिस्ट मॉडल पर काम किया गया। अभिभावकों को भी प्रशिक्षित किया गया। ऐसे में अब बच्चे की समझ बढ़ी है, व्यवहार शांत हुआ है।
ज्यादातर कार्टून और अपनी ही दुनिया में रहना
राजरूपपुर निवासी पांच वर्षीय बच्चे में समझ बिल्कुल नहीं थी, आंखों से संपर्क स्थापित न करना, ज्यादातर समय कार्टून और अपनी ही दुनिया में खोए रहना। बच्चा वर्चुअल ऑटिज्म, हाइपरएक्टिविटी और सामाजिक दूरी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। वर्ष 2024–2025 में वह कक्षा दो पास नहीं कर पाया। इस दौरान स्पेशल एजुकेशन और बिहेवियर थेरेपी का इस्तेमाल किया गया। माता-पिता को भी सही दिशा और ट्रेनिंग दी गई। अब बच्चे में सुधार हुआ है। 2025–2026 सत्र में वह अच्छे अंकों से पास हुआ।
वर्तमान में लोग ऑटिज्म के प्रति जागरूक हुए हैं। जिसके चलते बच्चों की समय से स्क्रीनिंग हो रही है और अधिक मामले सामने आ रहे हैं। अगर बच्चे की स्क्रीनिंग 18 से 24 महीने में हो जाए, तो बच्चों की थेरेपी समय रहते शुरू की जा सकती है। जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। -भास्कर मिश्रा, धर्मार्थ लर्निंग फाउंडेशन।
अधिकांश मामले में देखने को मिलता है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की स्क्रीनिंग कम होती है। लड़की का शांत रहना और आंखें न मिलाने को माता-पिता आदत मान लेते हैं। लेकिन अगर इस प्रकार के लक्षण तीन साल के अंदर दिखें, तो तुरंत स्क्रीनिंग करानी चाहिए। - डॉ. राकेश पासवान, मनोचिकित्सक, कॉल्विन अस्पताल।