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World Outism Day : बच्चे का आंख न मिलाना व बुलाने पर प्रतिक्रिया न देना हो सकता है ऑटिज्म

Thu, 02 Apr 2026 05:51 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यदि आपका बच्चा आंख नहीं मिला रहा है, आवाज लगाने पर सुनता नहीं, एक ही चीज को बार-बार दोहराता है, अकेले रहता है और अजीब हरकत करता है तो यह ऑटिज्म का लक्षण हो सकता है, ऐसे में बिना देर किए बच्चे की स्क्रीनिंग करा देनी चाहिए।
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आटिज्म से ग्रसित बच्चे को अभ्यास करती चिकित्सक। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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यदि आपका बच्चा आंख नहीं मिला रहा है, आवाज लगाने पर सुनता नहीं, एक ही चीज को बार-बार दोहराता है, अकेले रहता है और अजीब हरकत करता है तो यह ऑटिज्म का लक्षण हो सकता है, ऐसे में बिना देर किए बच्चे की स्क्रीनिंग करा देनी चाहिए। यदि 18 से 24 माह की उम्र में ऑटिज्म की पहचान हो जाए तो बच्चे में कम समय में अधिक सुधार देखने को मिलता है।

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क्या है ऑटिज्म

ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक आजीवन स्थिति है, जो सामाजिक व्यवहार, संचार और सीखने की क्षमता को प्रभावित करती है। यह आमतौर पर जीवन के पहले तीन वर्षों में दिखाई देता है, जिसमें दोहराव वाले व्यवहार, बातचीत में कठिनाई और संवेदी संवेदनशीलता प्रमुख लक्षण हैं।

अत्यधिक चंचलता (हाइपरएक्टिविटी)

अल्लापुर निवासी सात वर्षीय बच्ची में अत्यधिक चंचलता (हाइपरएक्टिविटी), आंखों से संपर्क न करना, बार-बार एक ही व्यवहार दोहराना, किसी की बात न सुनना, निर्देशों का पालन न करना और पढ़ाई-लिखाई में बिल्कुल रुचि न लेने जैसी समस्याएं थीं। 2023 से बच्ची की स्पीच, ऑक्युपेशनल और बिहेवियर थेरेपी के साथ वन चाइल्ड-वन थेरेपिस्ट मॉडल पर काम किया गया। माता-पिता को विशेष रूप से ट्रेनिंग दी गई। परिणामस्वरूप अब बच्ची शांत रहती है, चीजों को समझती है और स्कूल में अच्छा प्रदर्शन कर रही है।

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सुनी हुई बातों को दोहराना

सिविल लाइंस निवासी छह वर्षीय बच्चे को ठीक से बोलना नहीं आता था। वह केवल इकोलालिया (सुनी हुई बातों को दोहराना) करता था। उसमें समझ की कमी, हाइपरएक्टिविटी, बार-बार मेल्टडाउन और बहुत कम धैर्य जैसी चुनौतियां थीं। ऐसे में वन चाइल्ड-वन थेरेपिस्ट मॉडल पर काम किया गया। अभिभावकों को भी प्रशिक्षित किया गया। ऐसे में अब बच्चे की समझ बढ़ी है, व्यवहार शांत हुआ है।

ज्यादातर कार्टून और अपनी ही दुनिया में रहना

राजरूपपुर निवासी पांच वर्षीय बच्चे में समझ बिल्कुल नहीं थी, आंखों से संपर्क स्थापित न करना, ज्यादातर समय कार्टून और अपनी ही दुनिया में खोए रहना। बच्चा वर्चुअल ऑटिज्म, हाइपरएक्टिविटी और सामाजिक दूरी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। वर्ष 2024–2025 में वह कक्षा दो पास नहीं कर पाया। इस दौरान स्पेशल एजुकेशन और बिहेवियर थेरेपी का इस्तेमाल किया गया। माता-पिता को भी सही दिशा और ट्रेनिंग दी गई। अब बच्चे में सुधार हुआ है। 2025–2026 सत्र में वह अच्छे अंकों से पास हुआ।

वर्तमान में लोग ऑटिज्म के प्रति जागरूक हुए हैं। जिसके चलते बच्चों की समय से स्क्रीनिंग हो रही है और अधिक मामले सामने आ रहे हैं। अगर बच्चे की स्क्रीनिंग 18 से 24 महीने में हो जाए, तो बच्चों की थेरेपी समय रहते शुरू की जा सकती है। जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। -भास्कर मिश्रा, धर्मार्थ लर्निंग फाउंडेशन।

अधिकांश मामले में देखने को मिलता है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की स्क्रीनिंग कम होती है। लड़की का शांत रहना और आंखें न मिलाने को माता-पिता आदत मान लेते हैं। लेकिन अगर इस प्रकार के लक्षण तीन साल के अंदर दिखें, तो तुरंत स्क्रीनिंग करानी चाहिए। - डॉ. राकेश पासवान, मनोचिकित्सक, कॉल्विन अस्पताल।
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