हालांकि, सत्र अदालत ने अभियोजन की कहानी को संदेहास्पद मानते हुए आरोपियों को बरी कर दिया था। उसके खिलाफ मृतक के परिजन ब्रजेश की ओर से इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आखिरी बार देखे जाने (लास्ट सीन) का दावा करने वाले गवाहों ने घटना के कई दिन बाद तक पुलिस को जानकारी नहीं दी, जिससे उनकी गवाही संदिग्ध हो गई। शव मिलने के चार दिन बाद एफ़आईआर दर्ज की गई, जिसका कोई वाजिब कारण नहीं बताया गया। कोर्ट ने इसे सोच-समझकर की गई कार्रवाई की संभावना माना।
इसके अलावा कोर्ट ने पुलिस की ओर से साक्ष्य संकलन में भी कई खामियां पाईं। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने बरामद कपड़ों और पत्थर को फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा। इससे यह साबित नहीं हो सका कि उन पर मौजूद खून इन्सान का था या नहीं। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने माना कि मृतक के शरीर पर चोट नहर में ऊंचाई से गिरने के कारण भी आ सकती है। लिहाजा, कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर सजा तभी हो सकती है जब साक्ष्यों की कड़ी पूरी हो। इस मामले में लूट का मकसद भी साबित नहीं हो पाया।