करनाईपुर।इलेक्ट्रिक चाक पर मिट्टी के बर्तन तैयार करतीं कहली गांव की महिलाएं। संवाद
महिलाएं अब अपने हुनर से घर की आमदनी बढ़ा रही हैं। वे रोजी-रोटी के लिए परिवार से दूर दूसरे शहरों में मजदूरी करने से बच रही हैं। पुश्तैनी कुम्हारी कला को रोजगार का जरिया बनाया गया है।
महिलाएं इलेक्ट्रिक चाक पर मिट्टी के बर्तन, कुल्हड़ और दिए तैयार कर रही हैं। दिवाली नजदीक आने के साथ काम की रफ्तार तेज हो गई है। कहली गांव में सुबह से देर शाम तक इलेक्ट्रिक चाक घूमते नजर आते हैं। महिलाएं मिट्टी को चाक पर रखकर अलग-अलग आकार के बर्तनों में ढाल देती हैं। तैयार बर्तन और दिए आसपास के बाजारों में पहुंचाए जा रहे हैं। इससे परिवारों की आय में इजाफा हो रहा है।
गोमती देवी और राम-लखन प्रजापति ने बताया कि अब गांव में इलेक्ट्रिक चाक लगाकर पुश्तैनी काम को रोजगार का जरिया बनाया है। मशीन से मिट्टी को आकार देना आसान हो गया है। इससे कम समय में अधिक बर्तन तैयार होते हैं।
प्रजापति समाज के लोगों का कहना है कि मिट्टी खोदने के लिए पट्टा देने की बात कही गई थी। लेकिन अब तक इसका लाभ नहीं मिला है। मिट्टी की कमी के कारण कुम्हारी का काम प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद महिलाएं दिवाली की तैयारियों में जुटी हैं। वे अपनी पुश्तैनी कला को बचाने के साथ उसे रोजगार का नया आधार दे रही हैं।
करीब दस वर्ष पहले चाय के कुल्हड़ 20 रुपये सैकड़ा बिकते थे। अब इनकी बिक्री 60 रुपये सैकड़ा तक हो रही है। बर्तन तैयार करने में महिलाएं सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई और घरेलू जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल रही है। तैयार बर्तन दादूपुर, कहली, दोनैया, करनाईपुर, बसरही और बेनीपुर समेत आसपास के बाजारों में बेचे जाते हैं।