इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना जिरह हस्तलेख विशेषज्ञ (हैंडराइटिंग एक्सपर्ट) की राय किसी मुकदमे में कमजोर साक्ष्य है। इसके आधार पर किसी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की एकल पीठ ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) बागपत के लिपिक सचिन समेत तीन कर्मचारियों की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया। हालांकि, नए सिरे से जांच के दौरान याचियों के निलंबन पर सहमति जताई है।
मामला 2009 की लिपिक भर्ती से जुड़ा है। इसमें सचिन, संजीव और विपिन का चयन एसबीआई में हुआ था। 2011 में उनकी सेवा की पुष्टि भी हो गई थी। हालांकि, 2012-13 में बैंक ने उन पर आरोप लगाया कि लिखित परीक्षा में उनके स्थान पर किसी और ने परीक्षा दी थी। बैंक ने फॉरेंसिक लैब की हैंडराइटिंग रिपोर्ट को आधार बनाकर 2014 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि बर्खास्तगी आदेश महज हस्त लेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट के आधार पर पारित किया गया है। बर्खास्तगी से पहले याचियों को सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया।
कोर्ट ने पाया कि बैंक ने बर्खास्तगी की कार्रवाई केवल एक्सपर्ट की रिपोर्ट के आधार पर की। याचियों को उस एक्सपर्ट से सवाल पूछने या जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि हस्तलेख मिलान एक अपूर्ण वैज्ञानिक विधि है। इसमें त्रुटि की संभावना रहती है। इसलिए बिना पुख्ता जांच के इसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। बैंक ने अन्य साक्ष्यों की अनदेखी की। इस बात को नजरअंदाज किया कि परीक्षा केंद्र पर कक्ष निरीक्षक ने अभ्यर्थियों के अंगूठे के निशान और फोटो का मिलान किया था। उस वक्त कोई आपत्ति नहीं की गई थी। लिहाजा, कोर्ट ने बैंक को नए सिरे से जांच का आदेश देते हुए बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया। स्पष्ट किया है कि इस बार बैंक को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट के साथ-साथ अंगूठे के निशान और फोटोग्राफ जैसे अन्य पहचान चिह्नों का भी मिलान करना होगा।