नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के सीईओ के पद पर दस वर्षों से जमे आईएएस अधिकारी रमारमन की तैनाती पर हाईकोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल पूछा है। अदालत ने कहा कि सरकार बताए कि पिछले दस वर्षों से एक ही अधिकारी को क्यों नोएडा में तैनात रखा गया है। हो सकता है कि वह बहुत योग्य अधिकारी हों, अदालत उनकी योग्यता पर संदेह नहीं कर रही है मगर प्रदेश में दूसरे भी बहुत से काबिल अफसर हैं। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद दूसरे तमाम अधिकारी जो लंबे समय से यहां जमे थे हटा दिए, मगर रमारमन को फिर भी नहीं हटाया गया। इसका कारण स्पष्ट करने के लिए कहा है।
अखिल भारतीय मानव कल्याण एवं सामाजिक उत्थान समिति की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति दिलीप बी भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने 11 अगस्त को महाधिवक्ता से इस मुद्दे पर सरकार का स्टैंड क्लियर करने के लिए कहा है। पीठ ने यह भी बताने के लिए कहा है कि पिछले दस वर्षों में रमारमण किन-किन पदों पर और कहां-कहां तैनात रहे। नोएडा अथॉरिटी के अधिवक्ता ने कहा कि रमारमण सितंबर 2015 में ग्रेटर नोएडा के सीईओ बने हैं। इस हिसाब से उनको अभी एक वर्ष भी नहीं हुए। वह 2005 से नोएडा अथॉरिटी में तैनात रहे हैं। तीनों अथॉरिटी का सीईओ होने की बात भी सही नहीं है।
कोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करतेे हुए कहा कि जनहित याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह बहुत तथ्यात्मक दस्तावेज ही प्रस्तुत करेगा। उसकी जानकारी यदि कहीं गलत भी निकलती है तो याचिका खारिज करने का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में उनको नोएडा में ही रखा गया है, इसकी वजह पहले स्पष्ट की जानी चाहिए। इसके बाद ही वह अन्य मुद्दों पर तथ्यों के आधार पर सुनवाई करेंगे।
नोएडा मामले सुनवाई के दौरान अदालत उस वक्त ठहाकों से गूंज उठी जब महाधिवक्ता ने बहस के दौरान अचानक कोर्ट के समक्ष एक संदर्भ में कहा कि ‘हम यूपी वाले अंग्रेजी के मामले में पैदल हैं’। महाधिवक्ता की इस टिप्पणी के बाद पूरी अदालत में ठहाके गूंज उठे। बहस के दौरान उन्होंने कई ऐसी ही बातें कहीं, जिनको सुनकर जज भी मुस्कराए बिना नहीं रह सके।