रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे..., जौन टिकसवा से बलम मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें..., पानी बरसे टिकस गल जाए रे..। मालिनी अवस्थी ने जैसे ही इस गीत को सुर दिया संगीत की लहरों ने हिचकोले लेना शुरू कर दिया। मौका था सिविल लाइंस स्थित प्रयाग संगीत समिति के मेहता सभागार में तीन दिवसीय लोक संस्कृति उत्सव का।
रविवार शाम ‘लोक रंग, माटी के संग’ की भावना के साथ व्यंजना आर्ट एंड कल्चर सोसायटी की तरफ से तीन दिवसीय उत्सव का शुभारंभ हुआ। जिस लोकगीत से पद्मश्री मालिनी अवस्थी संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करती हैं, उन्होंने वही राग छेड़ा। हर ओर से वाह-वाह की आवाज शानदार प्रस्तुति न्योछावर रहीं। उन्होंने बुंदेलखंडी कोल्हाई, राय, बलमा, फाग, लमतेरा और ब्रज से जुड़े चरकुला, रस, फागुन की होली गाकर सुरों की बाढ़ ला दी, जिसमें श्रोता डूबते-उतराते रहे।
कार्यक्रम का संयोजन सोसायटी की अध्यक्ष मधु शुक्ला व राजेश तिवारी ने किया। इस मौके पर प्रो. साहित्य कुमार नाहर, प्रो. स्वतंत्र शर्मा, डॉ. राम बहादुर मिश्रा, गोपाल भाई, अतुल द्विवेदी, डॉ. रमाशंकर, उदय चंद्र परदेसी, महापौर गणेश केसरवानी, अनिल शुक्ला, शांभवी शुक्ला, श्रेयस शुक्ला, डॉ. धनंजय चोपड़ा, मृत्युंजय परमार, डॉ. रंजना त्रिपाठी, डॉ. अर्पित मिश्र, प्रद्युम्न पांडेय आदि मौजूद रहे।