वर्षों से एकत्रित, गंदे पानी में पाए जाते हैं नाइट्राइट्स एवं जीवाणु
जलकल विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षों से एकत्रित व गंदे पानी में नाइट्राइट्स पाए जाते हैं। इसके अलावा जो जीवाणु पाए गए हैं वे भी गंदे पानी में मिलते हैं। क्योंकि, समुद्र कूप का पानी उपयोग में नहीं है। इसके अलावा वह खुला है। ऐसे में कचरा होने के साथ जानवर भी गिरकर मर सकते हैं। इसलिए उसमें हानिकारक तत्व पाए गए हैं।
सफाई व क्लोरीनेशन के बाद पीने योग्य हो सकता है पानी
जलकल के अफसर अभी खुलकर बोलने से बच रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि कूप की सफाई कराके, नियमित क्लोरीनेशन से पानी को पीने योग्य बनाया जा सकता है। ऐसे मामले में 70 फीसदी सफलता की उम्मीद होती है। इसके लिए कूप से कचरा बाहर निकालने के साथ पंप के माध्यम से खराब पानी बाहर निकाला जा सकता है। यदि शुद्ध पानी का स्रोत मिल गया तो दिक्कत दूर हो सकती है। उनका कहना है कि इस विचार भी किया जा रहा है। अधिशासी अभियंता का कहना है कि कूप की सफाई की योजना बनाई गई है। क्लोरीनेशन समेत अन्य उपाय किए जाएंगे।
..लेकिन होगा सौंदर्यीकरण
कूप के पानी की गुणवत्ता की रिपोर्ट भले ही नकारात्मक आई हो, लेकिन उसका जीर्णोद्धार व सौंदर्यीकरण कराया जाएगा। इसका प्रस्ताव तैयार हो गया है। जल्द काम शुरू होगा।
विशेषज्ञों के माध्यम से रिपोर्ट का अध्ययन कराया जाएगा। कूप के जल को साफ कराया जा सकता है या नहीं इसे देखा जाएगा। पानी पीने योग्य बनाने को सभी कदम उठाए जाएंगे। समुद्र कूप का धार्मिक महत्व है। यहां ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था। कूप व आसपास के क्षेत्र का सौंदर्यीकरण कराया जाएगा। - गणेश केसरवानी, महापौर
समुद्र कूप का महत्व
मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने सृष्टि का पहला यज्ञ प्रयाग में करते समय सभी देवी-देवताओं समुद्र, नदियों व अन्य जल स्रोतों को आमंत्रित किया था। यज्ञ समाप्त होने पर जब लोग वापस जाने लगे तो ब्रह्माजी ने सभी से अपना-अपना अंश प्रयाग में छोड़ने का आह्वान किया। उनके आह्वान पर सभी समुद्र, नदियों व अन्य स्रोत ने अपने-अपने अंश छोड़े। मान्यता है कि इसी समुद्र कूप में सभी के अंश समाहित हैं। इसीलिए इसे समुद्र कूप कहा जाता है।