इलाहाबाद (ब्यूरो)। प्रगतिशील लेखन संघ (प्रलेस), जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की ओर से शुक्रवार को जाने-माने कवि वीरेन डंगवाल को याद किया गया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के सिविल लाइंस स्थित क्षेत्रीय केंद्र पर आयोजित स्मृति सभा में उनकी कविताएं पढ़ी गईं और उनकी रचनाओं की समीक्षा की गई। इसके पूर्व जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणयकृष्ण ने शोक प्रस्ताव पढ़ा और उनसे जुड़ी यादों को साझा किया।
सभा की अध्यक्षता करते हुए राजेंद्र कुमार ने कहा कि वीरेन का कविता संसार वैविध्यपूर्ण हैं, जो संघर्षों के बीच उम्मीदों की रौशनी दिखाती है। उन्होंने वीरेन की रचनाओं को उनके जिंदगी से जोड़ा। कहा कि उनकी जिंदगी और कविताएं उम्मीदों और नाउम्मीदों के बीच की लड़ाई थी, लेकिन उम्मीद का पक्ष प्रभावी रहा। सुधांशु मालवीय ने कहा कि उनकी कविताएं किताबों, पत्र-पत्रिकाओं, गोष्ठियों से निकलकर पोस्टर और जनमानस के कंठ तक पहुंच गई।
हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश नारायण शर्मा ने उनके छात्र जीवन की यादों को ताजा की। कहा कि उनकी वैचारिक समझदारी उतनी ही साफ थी, जितनी कि उनकी कविताएं। प्रलेस अध्यक्ष संतोष भदौरिया ने कहा कि प्रतिरोध की यात्रा में वे सबसे भरोसेमंद कवि थे। प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि वे उर्दू की नई शायरी को समझना चाहते थे और उर्दू शायरी को रोमांस से अलग इतिहास और राजनीति की नजर से देखते थे। ट्रेड यूनियन लीडर जीपी मिश्रा ने कहा कि वह न सिर्फ कवि थे, बल्कि मजदूर आंदोलनों के गहरे समर्थक और साथी थे। जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि वीरेन हिंदी के दुलखा कवि थे।
कवि अंशुल, सीमा आजाद, प्रलेस सचिव संध्या निवेदिता ने अपनी बात रखी। रतिनाथ योगेश्वर ने उनकी ‘मक्खी’ शीर्षक, प्रणयकृष्ण ने ‘इलाहाबाद 1970’ केके पांडेय ने ‘एसएमएस’ और संतोष भदौरिया ने ‘हम औरतें’ शीर्षक कविता का पाठ किया। कार्यक्रम का संचालन केके पांडेय ने किया। इस मौके पर कथाकार उर्मिला जैन, नीलम शंकर, आनंद मालवीय, हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन, अनिल रंजन भौमिक, प्रवीण शेखर, ओडी सिंह, सुनील मौर्या, मीना राय आदि मौजूद रहे।