इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, सुसंगत और भरोसेमंद है तो केवल इस आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही मेडिकल रिपोर्ट अभियोजन के पक्ष की पूरी तरह पुष्टि न करती हो। साथ ही ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई सात साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा। यह आदेश न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकलपीठ ने वीर सिंह की याचिका पर दिया।
आरोपी वीर सिंह के खिलाफ 1983 में गाजियाबाद के मोदी नगर थाने में दुष्कर्म के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई थी। याची की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता की मेडिकल जांच में डॉक्टर ने दुष्कर्म होने पर निश्चित राय नहीं दी। साथ ही एफआईआर दर्ज कराने में 24 घंटे की देरी, पीड़िता की कपड़े की फोरेंसिक जांच न होना और एक नामजद प्रत्यक्षदर्शी के पक्षद्रोही (होस्टाइल) हो जाने का भी हवाला दिया ।
कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर केवल हालिया दुष्कर्म के संकेतों पर राय दे सकता है। जबकि दुष्कर्म हुआ या नहीं, यह तय करना न्यायालय का कार्य है। केवल चिकित्सकीय साक्ष्य के अभाव में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। दुष्कर्म जैसे मामलों में अविवाहित लड़की और उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ी होती है। इसलिए एफआईआर दर्ज कराने में एक दिन की देरी स्वाभाविक है। इससे अभियोजन की कहानी संदिग्ध नहीं हो जाती। कोर्ट ने आरोपी को तीन सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया।