याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपने बहस में तर्क दिया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर संगीता श्रीवास्तव की नियुक्ति अवैध है और विश्वविद्यालय के ऑर्डिनेंस के अनुसार नियुक्ति नहीं की गई है। कहा गया कि प्रोफेसर श्रीवास्तव विश्वविद्यालय के कुलपति बनने की अर्हता नहीं रखती हैं।
उनके पास न्यूनतम 10 वर्ष की प्रोफेसर की योग्यता भी नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि वह वर्ष 2015 में प्रोफेसर बनीं और फरवरी 2020 में हेड ऑफ डिपार्टमेंट के रूप में काम करती रहीं। योग्यता की कमी के कारण उनकी कुलपति के रूप में नियुक्ति गलत व गैरकानूनी है। कोर्ट को इस संबंध में संबंधित प्रावधानों से भी याची की तरफ से अवगत कराया गया।
जवाब में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तरफ से कहा गया की प्रोफेसर श्रीवास्तव इसके पहले रज्जू भैया राज्य विश्वविद्यालय में भी बतौर कुलपति वह नियुक्त रही हैं। ऐसे में उनकी योग्यता को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना गलत है। कहा यह भी गया कि उनकी नियुक्ति होम साइंस प्रवक्ता के पद पर 2002 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई थी। उनकी नियुक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी वैध ठहराया है। कहा गया कि कुलपति की नियुक्ति के लिए 10 वर्ष प्रोफेसर के रूप में काम करना कोई आवश्यक नहीं है। चीफ जस्टिस की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद इस जनहित याचिका की पोषणीयता के मुद्दे पर निर्णय सुरक्षित कर लिया है।