याचिकाकर्ता ने 2013 में पुलिस भर्ती परीक्षा पास की थी। इसके बाद वैवाहिक विवाद में उसकी भाभी की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे के कारण पुलिस कांस्टेबल की नौकरी से उसे वंचित कर दिया गया। जबकि, वह उक्त मामले में बरी हो गया था। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कांस्टेबल की नौकरी से वंचित करने के वाराणसी के डीसीपी के आदेश पर रोक लगाते हुए पुनर्विचार कर नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। यह आदेश जेजे मुनीर की अदालत ने सिद्धार्थ सिंह की याचिका पर दिया है।
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याचिकाकर्ता ने 2013 में पुलिस भर्ती परीक्षा पास की थी। इसके बाद वैवाहिक विवाद में उसकी भाभी की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे के कारण पुलिस कांस्टेबल की नौकरी से उसे वंचित कर दिया गया। जबकि, वह उक्त मामले में बरी हो गया था। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने कहा कि एक मशीनी दृष्टिकोण हमेशा आपराधिक मामला दर्ज होने मात्र से आरोपी व्यक्ति को सार्वजनिक रोजगार से अयोग्यता की ओर ले जाता है, भले ही वह बरी हो गया हो। व्यक्ति के खिलाफ मामले की प्रकृति और उस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना होगा। समाज में मौजूदा परिस्थितियों में झूठे निहितार्थों के कारण मुकदमे दर्ज कराए जा रहे हैं।
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कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को साफ-सुथरी पृष्ठभूमि से, कड़ी मेहनत से पाए सार्वजनिक रोजगार से वंचित करना उचित नहीं है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए डीसीपी वाराणसी के तीन फरवरी 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। तीन सप्ताह में नया आदेश पारित करने के लिए पुलिस उपायुक्त को परमादेश जारी किया।