इसके बाद वैष्णव संत समाज के हितों की रक्षा के लिए पहली बार अखिल भारतीय रामानुज नारायणी अखाड़े के गठन का एलान किया गया। बक्सर से आए लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी इस अखाड़े के अध्यक्ष बनाए गए। कौशलेंद्र प्रपन्नाचार्य को महामंत्री बनाया गया। इनके अलावात्च्युत प्रपन्नाचार्य इस अखाड़े के उपाध्यक्ष घोषित किए गए। इस अखाड़े के पहले अध्यक्ष जीयर स्वामी ने कहा कि रामानुज परंपरा को आगे बढ़ाने और व्यवस्थित करने के लिए इस अखाड़े की लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही थी।
उन्होंने इस अखाड़े के जरिए सबके साथ न्याय और सहयोग के लिए खड़ा रहने का भरोसा दिलाया। इस मौके पर हैदराबाद से आए श्रीमन्नारायण चिन्न जीयर स्वामी, कर्नाटक से आए यदुगिरि यतिराज जीयर स्वामी, तमिलनाडु से आए संपत कुमार जीयर स्वामी, अयोध्या के जगदगुरु वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर स्वामी,परमार्थ भूषण पुरुषोत्तमाचार्य, जगदगुरु श्रीधराचार्य, डॉ. राघवाचार्य, अच्युत प्रपन्नाचार्य समेत कई संत उपस्थित थे।
नारायणी अखाड़े का गठन औचित्यहीन, नहीं दी जा सकती मान्यता: रवींद्र पुरी
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी महाराज ने वैष्णव संतों की ओर से नारायणी अखाड़े के गठन को औचित्यहीन और मनमर्जी वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में परंपरागत मान्य सिर्फ 13 अखाड़े ही हैं। ऐसे में किसी 14वें अखाड़े के गठन को मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि वैष्णव संत सम्मेलन में किसी भी अखाड़े का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। ऐसे में इस नवगठित संगठन या संस्था को अखाड़े के रूप में संत समाज के बीच प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।