बगावत के बावजूद भाजपा ने बनाई बढ़त
निकाय चुनाव में टिकट कटने के कारण भाजपा के कई कद्दावर नेताओं ने भी पार्टी से बगावत कर दी। कई ने तो खुद मैदान में उतरकर भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ा जबकि तमाम नेताओं ने विरोधी पार्टी के प्रत्याशियों का चोरी चुपके समर्थन कर भाजपा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी ने टिकट न मिलने पर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर कर पार्टी में हलचल पैदा कर दी। हालांकि उन्होंने टिकट की चर्चा न करके सपा नेता रईस चंद शुक्ला को भाजपा में शामिल करने का आधार बनाया, लेकिन यह सबको पता था कि उनकी नाराजगी किसलिए है।
इसी तरह कई वार्डों में जहां भाजपा के कद्दावर नेता जिन्हें पार्षद का टिकट नहीं मिलने पर वह बागी हो गए। राजरूपपुर से कई बार पार्षद रह चुके अखिलेश सिंह ने इस बार टिकट न मिलने पर भाजपा के खिलाफ ही ताल ठोक दिया। फिलहाल वह कई राउंड की मतगणना में वह भाजपा के गुलाब से पीछे चल रहे हैं। इसी तरह कई अन्य वार्डों का भी हाल है। भाजपा और केशव प्रसाद की बैठकों से निवर्तमान महापौर अभिलाषा गुप्ता ने भी दूरी बनाए रखी।
माफिया बंधुओं की हत्या से सपा को हुआ नुकसान
माफिया अतीक और उसके भाई अशरफ की पुलिस कस्टडी में हत्या से सपा को काफी नुकसान उठाना पड़ा। सपा ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाते हुए प्रचार किया, लेकिन इसका फायदा नहींं हुआ। स्थिति यह रही कि माफिया अतीक अहमद के इलाके में सपा की अपेक्षा कांग्रेस को अच्छी बढ़त मिली। अतीक के इलाके में मतदान प्रतिशत हालांकि कम रहा लेकिन जितने वोट पड़े उसमें सपा के प्रति नाराजगी दिखी।
वोटरों ने कहा- अखिलेश के उकसाने पर योगी ने लिया एक्शन
अतीक के इलाके में मतगणना के दिन मतदताओं में काफी गुस्सा दिखा। वह भाजपा से ज्यादा सपा के खिलाफ मुखर थे। मुस्लिम वोटरों का मानना था कि सपा मुखिया अखिलेश यादव के द्वारा विधानसभा में उकसाने के कारण योगी ने अतीक को निशाने पर लिया था। यदि अखिलेश उमेश पाल हत्याकांड को लेकर सरकार पर तंज न कसते तो शायद स्थिति कुछ और होती। मतदाताओं के मूड़ को भांपने के कारण ही अखिलेश यादव प्रयागराज में चुनावी सभा करने के लिए नहीं पहुंचे थे।