सबसे पहले मेरी मुलाकात दिनेश मेट नाम के एक सफाईकर्मी से हुई। उन्होंने बताया कि वो बांदा जिले से आते हैं। उनसे मेरा अगला सवाल था कि आप इतनी दूर से इस काम के लिए आए हैं वो क्यों? उनका सबसे पहला उत्तर था कि भैया ये कुंभ है, ऐसे मौके पर यहां आने का मौका मिला यह कम है क्या। मैंने उनसे पूछा कि आपका क्या काम होता है तो उनका उत्तर था कि वो संगम के किनारे जो भी गंदी चीजें जैसे- पॉलीथिन, चाय के जूठे कप या जो भी उन्हें दिखाई देता है वो उसे अपने पास वाले कूड़ेदान में डाल देते हैं और उसके बाद जब यह कचरा ज्यादा हो जाता है तो उसे एक बड़े से बैग में निर्धारित स्थान पर पहुंचा देते हैं।
मैं उनके बात कर रही था कि इसी बीच मेरी मुलाकात रोशनी से हुई जो सिहाब (बांदा ) से ही आई थी। मैंने लगभग वही सवाल जो दिनेश मेट से किए थे रोशनी के सामने रखे तो उन्होंने भी इतनी ही मासूमित के साथ उत्तर दिया, भैया गंगा मैया का काम है। इससे अच्छा और क्या हो सकता है। मैंने पूछा कि आपको इस काम के लिए कितने पैसे मिल जाते हैं तो उन्होंने बताया कि 12,000 तक मिल जाते हैं भैया। उनके साथ ही मोना नामक एक अन्य सफाईकर्मी भी वहां पर थी। उनसे बात करने पर भी कुछ ऐसे ही उत्तर मिले। लेकिन जो इन सब ने महसूस कराया वो था सबसे पहले उनकी गंगा के प्रति आस्था।
आस्था की रेती पर बह रही है दायित्व-बोध की बयार...
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ऐसे कर्मचारी सिर्फ घाटों तक सीमित नहीं, कुंभ मेले की सैकड़ों सड़कों पर इन्हें आसानी से देखा जा सकता है। कोई हर मिनट झाड़ू लगा रहा तो कोई कचरा एकत्र कर रहा है। बड़े-बड़े दावों और सुविधाओं के बीच इनके काम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर आप कुंभ आ रहे हैं तो इनके सहयोग को नजरअंदाज नहीं कर सकते। जैसा इनका स्लोगन है 'मैदानसाफ' आपको कुछ ऐसा नजारा भी यहां देखने को मिलेगा। यहां पर ऐसे काम करने वाले लोग इस महाआयोजन को सफल बनाने में दिन-रात लगे हुए हैं।