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उम्मीदों के शब्द लिए रचते रहे उमाकांत

Tue, 02 Aug 2016 01:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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उमाकांत मालवीय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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चर्चित नवगीतकार एवं निबंधकार उमाकांत मालवीय आज पूरे पचासी वर्ष केहोते। बीते दिनों जब जानी मानी गायिका मुबारक बेगम दुनिया से विदा हुईं तो इलाहाबाद से उनके रिश्ते को रेखांकित करते हुए मुबारक की गायी और उमाकांत की लिखी ठुमरी फिर याद आई। इलाहाबादी ठाठ-बाट के दोस्त इंसान उमाकांत लेखन में भी इस छाप और ठसक के साथ पाठकों से रिश्ता जोड़ते-सहेजते रहे।
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जयंती पर संभव प्रकाशन से उनकी चुनिंदा कविताओं का संकलन ‘गीत एक अनवरत नदी है’ पाठकों से रूबरू है। तीन हिस्सों में बंटी पुस्तक का पहला हिस्सा गीत कविताओं के नाम है। इसमें ‘मेहंदी और महावर, सुबह रक्त पलाश की और एक चावल नेह रींधा’ से चुने गए और कई असंकलित गीत भी शामिल हैं। दूसरे हिस्से में उनका काव्य नाटक ‘दृष्टि की खोज’ और आखिरी हिस्सा उनके खंडकाव्य ‘अभिशप्त अमरबेलि’ का है।

उनका क्रांतिकारी तेवर कविताओं में साफ दिखता है, ‘आओ हम भाषण दें/भूखों के सपनों में शोख चटख रंग भरें, प्यासों को मरीचिका दिखलाएं तंग करें/ और सब्जबागों के कोरे आश्वासन दें।’ ‘मेहंदी और महावर’ संग्रह में ‘उनकी सिंदूर रची मांग है भली, बादल के गांव ज्यों गुलाब की गली’ जैसे रागात्मकता में पगे हुए गीत हैं। उन्होंने भारतीय मिथक को आधार बनाकर ‘वह चंद्रमा उगा गणेश चौथ का/मां तुमने अर्घ्य दिया होगा मेरे लिए’ जैसे गीत और ‘टुकड़ा-टुकड़ा औरत’ जैसी मिथकीय कहानियां रचीं।
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एजी आफिस के सीनियर ऑडिटर रहे उमाकांत ने ट्रेड यूनियन और साहित्य के रिश्तों को भी बखूबी रेखांकित किया। पिता को याद करते हुए गीतकार यश मालवीय कहते हैं, उन्होंने हम सभी भाइयों को साहित्य के संस्कार दिए। उनका संघर्ष नई पीढ़ी के रचनाकारों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। प्रस्तुत संग्रह से इतर उनके प्रतिनिधि निबंधों का संग्रह भी जल्द ही पाठकों तक पहुंचेगा।
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