उर्दू अदब के बेमिसाल शायर और पद्मश्री बशीर बद्र के निधन पर साहित्य प्रेमियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। तामीर-ए-अदब संस्था की पहल पर शायरों ने उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश की।
शायर जावेद जिया ने कहा कि बशीर बद्र सिर्फ एक नाम नहीं, शायरी का एक दौर थे। उनका जाना उर्दू गजल की एक पूरी नस्ल का रुखसत होना है। शायर दानिश आइमी ने कहा कि बशीर बद्र ने मुश्किल अल्फाज को आम आदमी की जुबान तक पहुंचाया। उनकी गजलें मोहब्बत, दर्द और इंसानियत का पैगाम देती हैं।
शायर मकसूद दर्द ने बताया कि 1984 के मेरठ दंगों में बशीर बद्र का घर और उनकी सारी किताबें जला दी गई थीं। परिवार पर हमला हुआ था। उस दर्द के बावजूद उन्होंने नफरत नहीं बांटी। हमेशा अमन और मोहब्बत की बात की।
फैसल आइमी ने उनका शेर पढ़ा-कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फ़ासले से मिला करो’ और कहा कि ये शेर आज के दौर पर भी उतना ही सटीक है। कवि सुनील गुप्ता ने कहा कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत थी कि उन्होंने उर्दू गजल को हिंदी भाषी तक पहुंचाया। उनके मुशायरे सुनने के लिए गैर-उर्दू जानने वाले भी दीवाने रहते थे।