संगम की रेती पर शनिवार को ‘नमो नारायण’ के साथ ही ‘अलख निरंजन’ भी गूंजा। कुंभ मेले में अलखियों की अनूठी दुनिया भी सज गई। कहने को भले ही अवधूत संन्यासियों की छावनी ‘अलख दरबार’ में इनका ठौर है लेकिन एक बार अलखी वहां से निकले तो फिर पल भर के लिए भी इनके पांव नहीं रुके। ‘अलख निरंजन, अलख निरंजन’ की रट के साथ अखाड़े-अखाड़े घूमते, रमते अलखी साधुओं की गति ऐसी कि उनके संग पैदल चलना मुश्किल ही नहीं मुमकिन भी नहीं।
भिक्षाटन के लिए दोपहर के बाद ‘अलख दरबार’ से एक साथ निकलीं अवधूत संन्यासियों की कई-कई टोलियां अलग-अलग दिशाओं में बिखर गईं और गोधूलि से पहले ही लौटी। भ्रमण के दौरान वह उनके पांव न थके, न थमे। निकलने से पहले उन्हें अलख दरबार की छावनी में आचार्यों ने अलख जगाने की पारंपरिक दीक्षा दी। इसके बाद उन्हें अलखी का चोला पहनाया गया, जिसे साधुओं की भाषा में बाना बोलते हैं। अग्नि की परिक्रमा करके निकलते वक्त उन्हें चिमटा, खप्पर के साथ भैरव झोली दी गई। खास बात यह कि अलख दरबार के श्री महंतों ने भी सबसे पहले उनके खप्पर में भिक्षा देकर, उनके भिक्षाटन की शुरुआत की।
दोपहर के बाद से लेकर शाम तक भिक्षाटन के दौरान उनके खप्पर में जिसने जो भी डाल दिया, उसे उन्होंने स्वीकार करते हुए अपनी भैरव झोली में रख लिया। वह एक के बाद एक अखाड़े के शिविर-शिविर में अलख निरंजन कहते हुए भटकते रहे और भिक्षा स्वीकार करते रहे। शाम को लौटे तो उनकी भैरव झोली भरी हुई रही। परंपरा के मुताबिक भैरव झोली में जमा हुए अन्न से ही सुबह का भंडारा किया जाएगा। अलख दरबार के भंडारे के लिए उनका ‘चूल्हा चैतन्य’ जलता है, जिसका प्रसाद सभी पा सकते हैं। पूरे मेले के दौरान भिक्षाटन का यही क्रम बना रहेगा और भिक्षाटन के इसी अन्न से अलख दरबार की छावनी में संतों, श्रद्धालुओं के लिए भंडारा होता रहेगा।
‘मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए’ के सूत्रवाक्य के साथ निकले साधुओं के भिक्षाटन का मकसद भिक्षा मांगकर अपने अहंकार को मिटाना हैं। पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के श्रीमहंत दिनेश गिरि कहते हैं, जंगम साधुओं के बाद अलखियों की दुनिया भी साधु और संन्यास परंपरा की क ड़ी है। किसी भी संन्यासी के लिए अलख जगाकर भिक्षाटन करना परंपरा में शामिल है। इसमें शामिल होने वालों को यह भी सबक सिखाया जाता है कि साधु बनना है तो सभी तरह के वैभव से दूर रहें। अहंकार मुक्त होना और संत सेवा करना ही संन्यासियों का प्रमुख ध्येय है। भिक्षाटन करके वह सभी प्रकार के अहंकार से मुक्त होने के साथ ही संतसेवा के लिए भी प्रेरित होता है।