किसी भी शहर की पहचान उसकी रफ्तार से होती है। बदलते वक्त के साथ इलाहाबाद भी काफी कुछ बदल गया है। यह अच्छा है कि शहर का विकास हो रहा है लेकिन अब यह बडे़ और नामचीन बंगलों वाला शहर नहीं रहा। कभी यह शहर ‘अफोर्डेबल’ था, दस पैसे में स्टेशन से चौक तक का रिक्शा मिल जाता था। थोडे़ पैसे से भी आराम से आदमी जी सकता था। इसीलिए जितने संघर्षशील लेखक थे, वे इलाहाबाद को ही चुनते थे। उन दिनों मैं या मेरी पीढ़ी के दूधनाथ सिंह भी खस्ताहाल रहते थे लेकिन लोग दुखी नहीं थे।
साहित्य के केंद्र में इलाहाबाद ही था या यों कहें यह साहित्य का तीर्थ था। यहां के पुरोहितों को प्रणाम किए बगैर साहित्य में प्रवेश संभव नहीं था। इलाहाबाद ही साहित्य में आईएसआई का ठप्पा लगाता था। यहां की स्वीकृति पाए बगैर कोई साहित्य में जगह नहीं हासिल कर सकता था। आकर्षण यहां तक था कि मैं धर्मयुग की नौकरी छोड़कर इलाहाबाद आ गया। दूर रहकर भी धर्मवीर भारती कभी यहां से दूर नहीं हो पाए।
पंत, निराला, महादेवी, फिराक, भैरव प्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय, कमलेश्वर जैसे नायकों का शहर था। हमारे दौर के सभी नायक यहीं के थे। अब नायकविहीन होता जा रहा है इलाहाबाद। श्रीपति राय, डॉ.रामकुमार वर्मा सहित तीन या चार लेखकों के अतिरिक्त किसी लेखक के पास कार तो क्या, स्कूटर भी नहीं था।
जबर्दस्त हरियाली और साफ-सुथरी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें इलाहाबाद की पहचान थीं। हमारे दौर में जो इलाहाबाद का चौक था, अब सिविल लाइंस वैसा हो गया है। चौक अंतिम बाजार था, बंद होने वाला। लोकनाथ खाने-पीने का अड्डा था, जहां रात को भी लस्सी पीने या फिर सुबह कचौड़ी, जलेबी के लिए लोग जुटते थे। मशहूर लेखक बलवंत सिंह का तो वहीं मीरगंज में होटल ही था, जहां लेखक जुटते थे। एक कमी और खलती है। अब इलाहाबाद प्रकाशन का गढ़ नहीं रहा। भारती भंडार प्रकाशन के पास पंत, निराला, प्रसाद की रचनाओं का कापीराइट था। लोकभारती ने नरेश मेहता को लांच किया। ऐसी संस्थाएं अब नहीं रहीं।
पोनप्पा रोड, जार्जटाउन आदि की सड़कें नीम के पत्तों से पटी होती थीं और बेखौफ हम ज्ञानरंजन, दूधनाथ वगैरह देर रात तक बतियाते हुए घूमते रहते थे। काफी हाउस साहित्यकारों, रचनाकारों के मिलने-जुलने का अड्डा था। यहां भैरव प्रसाद गुप्त का ‘शनीचरी ग्रुप’ था जो शनिवार को आता था, वहीं विश्वम्भर नाथ मानव, विजयदेव नारायण साही, उपेंद्र नाथ अश्क, नीलाभ, दूधनाथ, अमरकांत आदि रोज आने वालों में थे। यहां साहित्य पर राष्ट्रीय स्तर की सारगर्भित बहसें होती थीं, अब न वैसा काफी हाउस रहा, न वैसे लोग।
(‘अमर उजाला’ के चर्चित कॉलम ‘मेरी नजर, मेरा शहर’ के लिए जैसा कहा)