विकास की अवधारणा एक छलावा है। विकास शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक दल और उद्योगपति अपने-अपने तरीके से करते हैं, जिसमें लोग विस्थापित किए जाते हैं और गरीबी व बेरोजगारी बढ़ती है। विकास का यह पैमाना सही नहीं है। इसमें बदलाव की जरूरत है। झूंसी स्थित गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में व्याख्यान देने आए देश के जाने-माने अर्थशास्त्री प्रो. प्रभात पटनायक ने विकास के मूल्यों पर प्रकाश डाला। इसके अलावा उन्होंने देश की औद्योगिक नीति और विकास के राजनीतिकरण पर भी कटाक्ष किए।
संस्थान में ‘विकास की अवधारणा’ विषयक व्याख्यानमाला की शुरुआत शुक्रवार को हुई। इस कड़ी में पहला व्याख्यान देते हुए प्रो. प्रभात ने कहा कि विकास मूलत: दो मान्यताओं पर आधारित है। पहला, एक परंपरा से दूसरी परंपरा में स्थानांतरित होने और दूसरा कृषि से बहुत तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ने पर। लेकिन, यह सही मायने में विकास नहीं है, क्योंकि इसमें व्यापक स्तर पर गरीबी बढ़ती है। प्रो. प्रभात ने लुइस मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि अत्यधिक पूंजी के संचय से केवल सस्ते मजदूर पैदा होते हैं। इससे केवल उद्योगपतियों को लाभ होता है। प्रो. प्रभात ने विकास के लिए तीन मुख्य तत्वों का जिक्र किया। पहला, कृषि और प्राथमिक उत्पादकों को आगे बढ़ाना होगा और उसे नई तकनीकों से जोड़ना होगा। दूसरा, जमीन की उत्पादकता को बढ़ाना, सिंचाई के तरीके को मजबूत करना और उत्पादक भूमि को कृषि के लिए संरक्षित करना होगा। तीसरे बिंदु पर उन्होंने कहा कि देश में जो भी उत्पादन तकनीकी के सहयोग से होते हैं, उनकी कीमतों को नियंत्रित करने की भी जरूरी है। सही मायने में विकास तभी संभव है, जब हम अपने प्राथमिक उत्पादन के साधन को मजबूत करेंगे और उनके लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।
इसी क्रम में व्याख्यान की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रमेश चंद्र दीक्षित ने विकास की वास्तविक स्थितियों से रूबरू कराया। संस्थान के निदेशक प्रो. बद्री नारायण ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत कर शुरुआत की। प्रो. केएन भट्ट ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर प्रो. एसके पंत, प्रो. भास्कर मजूमदार, प्रो. जीसी रथ, सहायक प्रोफेसर अर्चना सिंह, सहायक प्राध्यापक गोपानी, सहायक प्राध्यापक कुनाल केशरी तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर और छात्र मौजूद रहे।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रतन लाल हांगलू ने शुक्रवार को संस्थान में सुबह नौ बजे अकादमिक वर्ष 2018-19 के लिए एमफिल-डीफिल एकीकृत (विकास अध्ययन) के पाठ्यक्रम का उद्घाटन किया। उन्होंने संस्थान का ब्रोशर और अकादमिक कैलेंडर भी जारी किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि एक शोधछात्र को बिना किसी पूर्वाग्रह के खुले दिमाग से काम करना चाहिए। विकास की अवधारणा पर बात करते हुए कहा, इसकी कोई न तो निश्चित सीमा है और न हीं कोई निश्चित परिभाषा। उन्होंने गुणवत्ता पूर्ण शोध की वकालत की।