इस साल सस्ते में तरबूज, खरबूजा के बारे में सोचना छोड़ दीजिए। दो साल से झटका खा रहे किसानों को तरबूज और खरबूजा की फसलों ने भी झटका दे दिया है। इस बार किसान खरबूजा, तरबूज की फसलों की भरपूर पैदावार नहीं कर पाए हैं। उन्हें नुकसान उठाना पड़ा है। माहट (पौधों में लगने वाला रोग) से पौधे कमजोर हो गए। इससे उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं हो पाया, जिसके चलते उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। बाजार में बिक रहे छोटे-छोटे तरबूज 50 रुपये के मिल रहे हैं।
इलाहाबाद और उसके आसपास के जिलों में गंगा के तराई वाले इलाकों में इसकी खेती हर वर्ष गर्मी के महीने में की जा रही है। जिला कृषि अधिकारी गणेश प्रसाद दूबे कहते हैं कि इलाहाबाद के गंगा और यमुना के तराई इलाकों और शंकरगढ़, कोरांव इलाके में करीब 10 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती की जा रही है। इस बार किसानों ने खरबूजा, तरबूज के साथ खीरा, ककड़ी, लौकी की बुआई तो कर दी। पौधे भी आ गए लेकिन उनमें माहट (फसलों में लगने वाला माहू जैसा रोग) नामक रोग लग गया। इससे पौधे कमजोर हो गए और उनमें फल नहीं आए।
हनुमानगंज के पास स्थित ककरा के कक्षारी इलाके में तरबूज, खरबूजा की किसान महराज यादव कहते हैं कि इस बार उन्हें माहट के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया लेकिन पौधे कमजोर ही रहे। इसके चलते फल नहीं लग पाए। उन्होंने बताया कि वह ककरा के कछारी इलाके में 15 सौ पौधे तरबूज लगाए लेकिन अभी तक लागत नहीं निकल पाई है। 15 सौ पौधे पर करीब 35 से 40 हजार रुपये की लागत आई है जबकि पूर्व के वर्षों में उन्होंने सवा लाख रुपये तक की कमाई कर ली थी। यही हाल दूसरे किसान भी बता रहे हैं। खीरा, ककड़ी की पैदावार पर भी असर पड़ा है। रही सही कसर नीलगाय और सूखे ने पूरी कर दी है।