हाईकोर्ट के विस्तार भवन न्यायग्राम की आधारशिला रखने पहुंचे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शनिवार को हाईकोर्ट के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व और आजादी के बाद भी इस न्यायपालिका ने ऐतिहासिक फैसले दिए हैं। इससे भारत में लोकतंत्र की जड़े मजबूत हुईं हैं। उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, तेजबहादुर सप्रू और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के योगदान की भी चर्चा की। चौरीचौरा कांड और मेरठ षड्यंत्र कांड में आजादी से पूर्व हाईकोर्ट द्वारा दिए फैसलों का महत्व भी बताया।
राष्ट्रपति ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट से देश को पांच मुख्य न्यायाधीश मिले हैं। देश की पहली महिला अधिवक्ता कार्नेलिया सोराबजी को पंजीकृत इसी उच्च न्यायालय ने किया है। उन्होंने कहा कि भारत की साख को न्यायपालिका ने बढ़ाया है। स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि मुझे लोकतंत्र के तीनों अंगो ं(विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) से जुड़कर काम करने का अवसर मिला है। मौजूदा समय की चुनौतियों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि न्यायपालिका के समक्ष आम आदमी को सस्ता और समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने की चुनौती है।
सूचना प्रौद्योगिकी और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से हम इस चुनौती से निपट सकते हैं। राष्ट्रपति ने उम्मीद जताई कि न्यायग्राम परियोजना इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। निचली अदालतों की क्षमता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है। न्यायिक अकादमी इस लक्ष्य को हासिल करने में मददगार सबित होगी। न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। मंच पर हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष अनिल तिवारी, एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पीके जैन भी मौजूद थे। समारोह की शुरुआत दीप प्रज्जवलन और राष्ट्रगान के साथ हुई। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने समारोह स्थल से बटन दबाकर न्यायग्राम के शिलापट्ट का अनावरण किया। समारोह का संचालन न्यायिक अधिकारी एचआर मेंहदी ने किया।
राष्ट्रपति ने लंबित मुकदमों, जजों की कमी और न्याय मिलने में होनी वाली देरी पर अपनी चिंता जताते हुए कहा कि गरीब आदमी को न्याय मिलने में होने वाली देरी असहनीय होती है। न्याय की आस लेकर अदालत आने वाले व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए। इसलिए जरूरी है कि न्याय उसकी भाषा में हो।
16 दिसंबर 1971 को भारतीय फौजों ने अपनी सबसे बड़ी सामरिक जीत हासिल की थी। इसी दिन बांग्लादेश के ढाका में भारतीय फौज ने पाकिस्तान के हजारों सैनिकों को आत्मसमर्पण कर बंदी बना लिया था। इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्टपति ने कहा कि वह इस समारोह को उन बहादुर सैनिकों को समर्पित करते हैं, जिन्होंने हमें इतनी बढ़ी जीत दिलाई।