प्रयागराज समेत आसपास के जिलों में नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की कमी से मानसिक रोगियों को परेशानी हो रही है। उन्हें दिव्यांग प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) तक जाना पड़ रहा है। लंबे समय से समस्या बनी हुई है।
कौशाम्बी, प्रयागराज और प्रतापगढ़ तीनों जिलों में केवल एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक है। यहां हर हफ्ते 50 से अधिक मानसिक रोगियों की काउंसिलिंग होती है। डॉक्टर न होने की वजह से इस काम में बाधा आ रही है। सबसे अधिक समस्या प्रमाण पत्र बनवाने में हो रही है।
दरअसल, गैर संचारी रोग कार्यक्रम से जुड़ी नैदानिक मनोवैज्ञानिक ईशान्या राज ने चार अप्रैल 2025 को मोती लाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय (कॉल्विन) से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद कौशांबी में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अधीन कार्यरत नैदानिक मनोवैज्ञानिक पंकज कौटार्य को प्रयागराज से संबद्ध कर दिया गया। वे हफ्ते में एक दिन बुधवार को प्रयागराज में सेवाएं देते हैं। सोमवार को कौशांबी में जांच करते हैं। प्रतापगढ़ में कोई व्यवस्था न होने के कारण वहां के मानसिक रोगियों को भी जांच के लिए प्रयागराज भेजा जाता है।
प्रयागराज में सोमवार को सीएमओ कार्यालय में दिव्यांग बोर्ड की बैठक होती है। इसके बाद मानसिक रोगियों को कॉल्विन अस्पताल भेजा जाता है, जहां बुधवार को नैदानिक मनोवैज्ञानिक जांच करते हैं। इस व्यवस्था के कारण प्रतापगढ़ के अधिकतर मानसिक रोगियों को केजीएमयू रेफर करना पड़ता है। समय पर जांच न होने से कई रोगियों के यूडीआईडी कार्ड भी नहीं बन पा रहे हैं, जिससे वे सरकारी लाभों से वंचित रह जाते हैं।
नैदानिक मनोवैज्ञानिकों की भूमिका
नैदानिक मनोवैज्ञानिक मानसिक, भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याओं से जूझ रहे व्यक्तियों के साथ काम करते हैं। वे मनोवैज्ञानिक संकट को कम करने में सहायता करते हैं। साथ ही मनोवैज्ञानिक कल्याण को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी विशेषज्ञता मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवश्यक है।
कौशांबी, प्रयागराज व प्रतापगढ़ में सिर्फ एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक है। मानसिक रोगियों को प्रयागराज के अलावा लखनऊ के केजीएमयू जांच के लिए भेजना पड़ता है। यहां के लिए एक और नैदानिक मनोवैज्ञानिक की मांग की गई है। -डॉ. नवीन गिरी, नोडल, दिव्यांग बोर्ड, सीएमओ कार्यालय।